श्री पुष्कर मुनि जी म. सा.

पुरुषार्थ पुरूशोतम उपाध्याय पुष्कर मुनिजी

उपाध्याय श्री के पौत्र शिष्य, पुष्पेन्द्र मुनिजी


 

जन्म दिवस पर विशेष : 9  अक्टूबर  2011


 सभी व्यक्ति एक समान नहीं होते हैं। कुछ व्यक्तियों में क्षमताएं होते हुए भी वे अपने कार्यें में सफलता अर्जित नहीं कर पाते हैं और कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिनमें पर्याप्त क्षमताएं नहीं होती है, फिर भी वे कठोर परिश्रम एवं सुदृढ़ मनोबल के सहारे सफलता अर्जित कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि मनुष्य की सफलता उसके पुरुषार्थ पर निर्भर करती है। कहा गया है कि रसरी आवत जात से सिल पर पड़त निसान। एक कोमल रस्सी जब बार-बार किसी कठोर चट्टान को घिसते हुए उसे काट सकती है तो फिर मनुष्य सफलता अर्जित क्यों नहीं कर सकता? अवश्य करता है, केवल उसे पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है।

जब हम साधना के शिखर पुरुष विश्वसंत उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी म. के जीवन पर दृष्टिपात करते हैं तो ज्ञात होता है कि उन्होंने पुरुषार्थ के माध्यम से ही ज्ञान और साधना के क्षेत्र में उच्च स्थान प्राप्त किया। पूज्य उपाध्यायश्री के जीवन पर हम सांकेतिक रूप से विचार कर अपने कथन की पुष्टि करना चाहते हैं।

 यह सर्व विदित है कि पू. उपाध्यायश्री का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस कारण वे ज्ञान प्राप्ति के लिए सजग थे। जैन भागवती दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् उन्होंने विद्वान गुरुओं के सान्निध्य में रहकर ज्ञान प्राप्त किया। इसके लिये उन्होंने कभी भी प्रमाद नहीं किया। ज्ञानार्जन करने के पश्चात् वे अपने ज्ञान की पुनरावृत्ति भी नियमित रूप से करते थे। इसके लिए नियमित स्वाध्याय, प्रवचन और लेखन वे करते रहते थे। परिणामस्वरूप आज उनके द्वारा रचित विपुल साहित्य उपलब्ध है और कालान्तर में जब उनके शिष्य और प्रशिष्य हुए तो उन्होंने उन्हें भी सर्वप्रकार से ज्ञानार्जन कराया। परिणामस्वरूप उनके एक शिष्यरत्न आचार्य पद पर पदासीन किये गये। ये ही आचार्य श्री देवेनद्रमुनिजी म. एक प्रख्यात साहित्य मनीषी के रूप में भी प्रख्यात हैं। उन्होंने अनेक कालजयी ग्रंथ रत्नों की रचना कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। उनके अन्य शिष्य और प्रशिष्य भी ज्ञान के क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके हैं और कर रहे हैं। उपाध्यायश्री का श्रमणी परिवार भी उच्च शिक्षा प्राप्त है और वे परम विदुषी है तथा अपने गुरुवर के नाम को उज्ज्वल कर रहा है।

 पू.उपाध्यायश्री समाज और श्रमण संघ की एकता और संगठन के महत्त्व को भलीभांति समझते थे। जिस समय श्रमण संघ की एकता की चर्चा चल रही थी, उस समय आप युवा ही थे और अपनी ज्ञान एवं संयम साधना के लिए चर्चित हो गये थे। श्रमण संघ की एकता के लिये आपने एक सेतु का काम किया। आपके अथक परिश्रम का परिणाम यह हुआ कि स्थानकवासी जैन सम्प्रदायों के अनेक आचार्यों /संघ प्रमुखों ने श्रमण संघ की एकता के लिये एक स्वर में समर्थन किया और अपने-अपने पदों का विसर्जन भी कर दिया। अंतत: श्रमण संघ का गठन हुआ। उल्लेखनीय यह है कि अन्य अनेक श्रमणों के मुकाबले कम आयु के होने के बावजूद आपको शिक्षा मंत्री का उत्तरदायित्व सौंपा गया। आप अपने जीवन के अंतिम समय तक श्रमण संघ की एकता के लिए कठोर अध्यवसाय करते रहे।

 साधना के क्षेत्र में पू.उपाध्यायश्री ध्यान साधना और जप साधना की महत्ता से भी परिचित थे। इसलिये आपने अपने संयमी जीवन में जप और ध्यान साधना को विशेष स्थान दिया। आपकी नियमित ध्यान एवं जप साधना का परिणाम भी देखने को मिला। यह सर्वविदित है कि जैन श्रमण कभी भी अपनी लब्धियों का प्रदर्शन नहीं करते हैं। प्रदर्शन तो ठीक, वे कभी इस संबंध में किसी से चर्चा तक नहीं करते हैं। किन्तु जिस साधक को लब्धियां उपलब्ध हो जाती हैं, वे स्वत: उनके द्वारा दी जाने वाली मांगलिक के माध्यम से प्रकट होने लगती है। पू.उपाध्यायश्रीजी म. के संबंध में भी हम यह कह सकते हैं कि ध्यान एवं जप की साधना से उन्हें कुछ लब्धियां प्राप्त थी। उनके जीवन में अनेक प्रकार के चमत्कार घटित हुए। उनकी मांगलिक से अनेक भव्य प्राणियों के कष्ट दूर हुए। अनेक गुरुभक्तों के कार्य प्रशस्त हुए। उनकी प्रेरणा और मंगल वचन से अनेक स्थानों पर कलह के स्थान पर भी मैत्री की स्थापना हुई। विशेष उल्लेखनीय है कि पू.उपाध्यायश्री अनेक वर्षों से 12 बजे के समय ध्यान साधना के पश्चात् मांगलिक फरमाया करते थे जिसका अचिन्त्य प्रभाव देखने को भी मिला। आपकी मांगलिक श्रवण से अनेक भव्य प्राणियों को अनसोचा लाभ मिला। उनकी समस्याओं का अनायास ही समाधान हो गया और आगे का मार्ग प्रशस्त हो गया।

पू.उपाध्यायश्री ने समाज सुधार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किये। इस कार्य के लिये उन्हें पृथक से कोई प्रयास नहीं करने पड़े। उनके वचनों का ही ऐसा प्रभाव था कि सुनने वाला स्वत: उनके आदेश का पालन करने के लिए तत्पर हो जाया करता था। श्रोता उनके वचनों को आदेश मानकर उसके अनुरूप अनुसरण करने में अपना कल्याण समझता था और वैसा होता ही था।

आज पू.उपाध्यायश्री हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनके द्वारा रचित साहित्य के माध्यम से हमें उनके विचार आज भी प्रेरणा प्रदान करते रहते हैं। भौतिक रूप से वे भले ही नहीं हों, किन्तु वैचारिक रूप से आज भी हमें आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं। वे सही अर्थों में पुरुषार्थ पुरुषोत्तम थे। मैं âदय की गहराई से अपने दादा गुरुदेव को सादर सश्रद्धा, सभक्ति श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। यही कामना है कि उनका दिव्य आशीर्वाद सदा बना रहे।

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Article Uploaded on 9th September, 2011

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