विश्व धर्मों की दृष्टि से मध्य पूर्व एशिया का संघर्ष

लेखक: अनिल के. जैन, अध्यक्ष – अहिंसा फाउंडेशन इंडिया
वरिष्ठ मैक्रो इकोनॉमिस्ट
यह लेख विश्व के प्रमुख धार्मिक नेताओं और आध्यात्मिक परंपराओं द्वारा खाड़ी एवं मध्य पूर्व संघर्ष—विशेष रूप से इज़राइल, ईरान, फ़िलिस्तीन, अमेरिका तथा अन्य क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों से जुड़े विवाद—पर व्यक्त विचारों का एक व्यापक अवलोकन प्रस्तुत करता है।
ईसाई धर्म, इस्लाम, यहूदी धर्म, बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म, तथा अन्य परंपराओं के धार्मिक नेताओं ने अपने-अपने धार्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक और भू-राजनीतिक दृष्टिकोणों के आधार पर इस संघर्ष पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
कुछ नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रबल समर्थन किया है, जबकि अन्य ने अहिंसा, मानवीय संरक्षण, कूटनीति, अंतरधार्मिक संवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर बल दिया है। कई धार्मिक आवाज़ों ने धर्म और शास्त्रों का उपयोग युद्ध, घृणा, प्रतिशोध या भू-राजनीतिक प्रभुत्व को उचित ठहराने के लिए किए जाने के खतरों के प्रति भी चेतावनी दी है।
कैथोलिक ईसाई दृष्टिकोण
कैथोलिक चर्च के नेतृत्व, विशेष रूप से पोप फ्रांसिस और बाद में पोप लियो XIV ने लगातार शांति, मानवीय सहायता और संयम पर बल दिया है। पोप फ्रांसिस ने इज़राइली नागरिकों पर हमास के हमलों की निंदा की, लेकिन साथ ही गाज़ा में हुए व्यापक विनाश और नागरीक पीड़ा की भी तीखी आलोचना की। उन्होंने बार-बार युद्धविराम, बंधकों की रिहाई, मानवीय सहायता और इज़राइल-फ़िलिस्तीन के बीच “दो-राष्ट्र समाधान” की अपील की। उनका प्रसिद्ध
कथन — “आतंक को आतंक से उचित नहीं ठहराया जा सकता” — इस बात को दर्शाता है कि प्रतिशोध सामूहिक दंड में परिवर्तित नहीं होना चाहिए।
पोप लियो XIV ने भी इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए विश्व नेताओं को धर्म का उपयोग युद्ध को उचित ठहराने के लिए न करने की चेतावनी दी तथा “हथियारों और सैन्यवाद की अर्थव्यवस्था” की आलोचना की। वैटिकन सामान्यतः इज़राइल की सुरक्षा के अधिकार
को स्वीकार करता है, ईरान के साथ कूटनीति का समर्थन करता है और अमेरीका सहित शक्तिशाली देशों के अत्यधिक सैन्यवाद पर चिंता व्यक्त करता है।
सुन्नी इस्लामी दृष्टिकोण
सुन्नी इस्लामी नेताओं में अहमद अल-तैयब सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक रहे हैं। उन्होंने गाज़ा में नागरिकों की हत्या की कड़ी निंदा की, फ़िलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन किया और मुस्लिम पीड़ा के प्रति पश्चिमी देशों के “दोहरे मापदंड” की आलोचना की। साथ ही उन्होंने मुस्लिम-ईसाई संवाद और अंतरधार्मिक सद्भाव को भी बढ़ावा दिया।
अन्य सुन्नी विद्वानों जैसे यूसुफ़ अल-क़रदावी ने ऐतिहासिक रूप से फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध आंदोलनों का समर्थन किया तथा इज़राइल और अमेरिका की नीतियों की तीखी आलोचना की। वहीं अली गोमा जैसे नेताओं ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाते हुए आतंकवाद की निंदा की और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का आह्वान किया। सामान्यतः सुन्नी नेतृत्व फ़िलिस्तीन के मुद्दे को न्याय और मानवीय अधिकारों का प्रश्न मानता है, साथ ही क्षेत्रीय युद्ध और अस्थिरता को लेकर भी चिंतित है।
शिया इस्लामी दृष्टिकोण
शिया इस्लामी दृष्टिकोण मुख्यतः ईरान के धार्मिक नेतृत्व, विशेषकर अली ख़ामेनेई, से प्रभावित है। वे इस संघर्ष को “ज़ायोनिज़्म और पश्चिमी प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध” के रूप में प्रस्तुत करते हैं और ईरान को उत्पीड़ित मुसलमानों का रक्षक मानते हैं। ईरानी धार्मिक नेतृत्व प्रायः इज़राइल को विस्तारवादी शक्ति तथा अमेरीका
को उसके सैन्य और राजनीतिक प्रभुत्व का प्रमुख समर्थक मानता है।
हालाँकि ईरान के बाहर के प्रभावशाली शिया नेता, जैसे अली अल-सिस्तानी, अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए संयम, सांप्रदायिक हिंसा से बचाव तथा नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर बल देते हैं।
यहूदी धार्मिक दृष्टिकोण
यहूदी धार्मिक नेतृत्व सुरक्षा-केंद्रित और शांति-केंद्रित विचारों के बीच विभाजित दिखाई देता है। रूढ़िवादी और राष्ट्रवादी रब्बी जैसे यित्झाक योसेफ और डेविड लॉ इज़राइल के सैन्य आत्मरक्षा के अधिकार का प्रबल समर्थन करते हैं तथा ईरान और हमास जैसे उग्रवादी संगठनों को अस्तित्वगत खतरा मानते हैं।
दूसरी ओर, प्रगतिशील यहूदी चिंतक और रब्बी जैसे जोनाथन और आर्थर वास्को अंतरधार्मिक संवाद, नैतिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों पर बल देते हैं। कुछ प्रगतिशील यहूदी नेताओं ने गाज़ा में नागरिक हताहतों की आलोचना की तथा युद्धविराम और मेल-मिलाप का समर्थन किया, जबकि इज़राइल के सुरक्षित अस्तित्व के अधिकार को भी स्वीकार किया।
बौद्ध दृष्टिकोण
बौद्ध नेताओं ने सामान्यतः अहिंसा और मानवतावाद पर आधारित दृष्टिकोण अपनाया है। दलाई लामा ने बार-बार करुणा, संवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर बल दिया है तथा गाज़ा और व्यापक क्षेत्र में हिंसा को “अकल्पनीय” बताया है। उनका कहना है कि “हिंसा केवल और अधिक हिंसा को जन्म देती है।” स्वर्गीय थिक न्यात हान्ह की शिक्षाएँ भी बौद्ध प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती हैं, विशेष रूप से उनकी “एंगेज्ड बुद्धिज़्म” और मेल-मिलाप की अवधारणा, जो प्रतिशोध के बजाय उपचार पर ज़ोर देती है।
हिंदू धार्मिक दृष्टिकोण
हिंदू धार्मिक नेताओं के विचार आध्यात्मिकता, राष्ट्रवाद और भू-राजनीतिक चिंताओं से प्रभावित होकर विविध रूप में सामने आते हैं। श्री श्री रविशंकर और सद्गुरु जग्गी वासुदेव जैसे आध्यात्मिक नेताओं ने शांति, संवाद और अंतरधार्मिक समझ पर बल दिया तथा पहचान-आधारित घृणा और उग्रवाद के विरुद्ध चेतावनी दी।
स्वामी अवधेशानंद गिरि ने भी सद्भाव और नागरिकों पर हिंसा की निंदा की। दूसरी ओर, मोहन भागवत जैसे राष्ट्रवादी हिंदू नेताओं और भारत के अनेक रणनीतिक विचारकों ने इज़राइल की आतंकवाद-विरोधी नीति के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, क्योंकि वे इसे भारत के अपने आतंकवाद संबंधी अनुभवों से जोड़कर देखते हैं।
जैन धार्मिक दृष्टिकोण
जैन धर्म के नेता पूर्ण अहिंसा के सबसे प्रबल समर्थकों में गिने जाते हैं। डॉ. शिव मुनि, डॉ. राजेन्द्र मुनि, आचार्य महाश्रमण और आचार्य लोकेश मुनि जैसे नेताओं ने लगातार अहिंसा, करुणा, संयम और शांतिपूर्ण समाधान पर बल दिया है। जैन दर्शन किसी भी जीव के विरुद्ध युद्ध, प्रतिशोध और हिंसा को अस्वीकार करता है। इसलिए जैन नेता आतंकवाद के साथ-साथ ऐसी सैन्य कार्रवाई की भी निंदा करते हैं जिसमें नागरिकों को नुकसान पहुँचता हो। वे इज़राइल, ईरान, अमेरीका और उग्रवादी समूहों सहित सभी पक्षों से मानवीय और नैतिक समाधान अपनाने का आग्रह करते हैं।
पारसी / ज़रथुष्ट्र दृष्टिकोण
पारसी जोरोस्ट्रियन धर्म के नेता सामान्यतः संतुलित और सभ्यतागत दृष्टिकोण अपनाते हैं। दस्तूर खुर्शीद दस्तूर और दस्तूर पेशोतन मिर्ज़ा जैसे नेता नैतिक सभ्यता, सत्य, संयम और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
पर बल देते हैं। चूँकि जोरोस्ट्रियन धर्म की उत्पत्ति प्राचीन फ़ारस (ईरान) में हुई थी, इसलिए कई पारसी ईरान से सांस्कृतिक जुड़ाव महसूस करते हैं, जबकि वे पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों और इज़राइल की बहुलतावादी व्यवस्था की भी सराहना करते हैं।
चीनी धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण
चीनी धार्मिक और दार्शनिक परंपराएँ—जो बौद्ध, कन्फ्यूशियस और ताओ विचारधाराओं से प्रभावित हैं—सामान्यतः सद्भाव, स्थिरता और अराजकता से बचाव को प्राथमिकता देती हैं। मास्टर ह्सिंग यून जैसे बौद्ध नेताओं ने “मानवतावादी बौद्ध धर्म” को बढ़ावा दिया, जो राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर करुणा पर बल देता है। शाओलिन परंपरा से जुड़े धार्मिक विचार भी अनुशासन, संतुलन और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर ज़ोर देते हैं। चीनी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराएँ वैचारिक ध्रुवीकरण से बचते हुए कूटनीतिक समाधान और संतुलित बहुध्रुवीय संबंधों को प्राथमिकता देती हैं।
जापानी धार्मिक दृष्टिकोण
जापानी धार्मिक संस्कृति, जो बौद्ध धर्म, शिंतो परंपराओं और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शांतिवादी सोच से प्रभावित है, बड़े पैमाने के युद्ध और सैन्यवाद का विरोध करती है। दाइसाकु इकेदा जैसे नेताओं ने परमाणु निरस्त्रीकरण, सभ्यताओं के बीच संवाद और शांति कूटनीति का समर्थन किया।
निचिको निवानो ने भी अंतरधार्मिक संवाद और शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित किया। जापानी धार्मिक दृष्टिकोण सामान्यतः इज़राइल की सुरक्षा चिंताओं को समझते हैं, लेकिन ईरान, अमेरिका और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच बढ़ते युद्ध से उत्पन्न मानवीय संकट को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं।
इवेंजेलिकल ईसाई दृष्टिकोण
अमेरिका के अनेक इवेंजेलिकल ईसाई नेता रणनीतिक और धार्मिक दोनों कारणों से इज़राइल का प्रबल समर्थन करते हैं। जॉन हेगी और पैट रॉबर्टसन जैसे प्रभावशाली पादरी इज़राइल को बाइबिलीय भविष्यवाणी का केंद्र मानते हैं तथा अमेरिका और इज़राइल को “जूदेव-ईसाई सभ्यता” के स्वाभाविक सहयोगी के रूप में देखते हैं। ये नेता ईरान और उग्रवादी इस्लामी समूहों को इज़राइल और वैश्विक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। इसलिए इवेंजेलिकल आंदोलन अमेरिका-इज़राइल रणनीतिक सहयोग और ईरान के प्रति कठोर नीति का समर्थन करता है।
ऑर्थोडॉक्स ईसाई दृष्टिकोण
ऑर्थोडॉक्स ईसाई नेतृत्व भू-राजनीतिक और मानवीय दोनों चिंताओं को प्रतिबिंबित करता है। पैट्रिआर्क किरिल ने प्रायः पश्चिम-विरोधी भू-राजनीतिक कथाओं का समर्थन किया और पारंपरिक ईसाई सभ्यता की रक्षा पर बल दिया।
दूसरी ओर, मध्य पूर्व के ऑर्थोडॉक्स नेता, जैसे पैट्रिआर्क थियोफिलॉस III, पवित्र स्थलों की सुरक्षा, पवित्र भूमि में ईसाई समुदायों के संरक्षण और युद्धविराम तथा नागरिक सुरक्षा की अपील करते रहे हैं।
सिख धार्मिक दृष्टिकोण
सिख धार्मिक नेतृत्व न्याय और मानवीय नैतिकता के संतुलन पर आधारित दृष्टिकोण अपनाता है। ज्ञानी रघबीर सिंह जैसे नेताओं ने निर्दोष लोगों की रक्षा, उग्रवाद के विरोध और संघर्ष के समय भी नैतिक संयम पर बल दिया। सिख शिक्षाएँ उत्पीड़न के विरुद्ध खड़े होने का समर्थन करती हैं, लेकिन प्रतिशोध और क्रूरता को हतोत्साहित करती हैं। इसलिए सिख दृष्टिकोण आतंकवाद की निंदा करता है, साथ ही ऐसी अंधाधुंध सैन्य कार्रवाई का भी विरोध करता है जिससे नागरिकों को हानि पहुँचे।
अंतरधार्मिक और वैश्विक शांति दृष्टिकोण
कई अंतरधार्मिक और वैश्विक शांति नेताओं ने धर्मों और राष्ट्रों के बीच ध्रुवीकरण को कम करने का प्रयास किया है। डेसमंड टूटू ने मेल-मिलाप, न्याय और फ़िलिस्तीनियों की पीड़ा पर जोर देते हुए घृणा और हिंसा का विरोध किया। धार्मिक विदुषी करेन आर्मस्ट्रांग ने बार-बार धार्मिक उग्रवाद और राजनीति से प्रेरित धर्म के खतरों के प्रति चेतावनी दी। विश्वभर में अंतरधार्मिक पहलें यह तर्क देती हैं कि धर्म को राष्ट्रवाद या भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन बनने के बजाय शांति, करुणा और सह-अस्तित्व की शक्ति बनना चाहिए।
निष्कर्ष
इज़राइल, ईरान, फ़िलिस्तीन, अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों से जुड़ा मध्य पूर्व संघर्ष अब केवल राजनीतिक या सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है; यह विश्व समुदाय के लिए एक गहरा नैतिक, मानवीय, सभ्यतागत और आध्यात्मिक संकट बन चुका है। विभिन्न धर्मों के नेताओं ने अपनी धार्मिक परंपराओं, ऐतिहासिक अनुभवों, सांस्कृतिक मूल्यों और भू-राजनीतिक दृष्टिकोणों के आधार पर प्रतिक्रिया दी है।
जहाँ कुछ नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद-विरोध और रणनीतिक गठबंधनों पर बल दिया है, वहीं अनेक अन्य नेताओं ने शांति, करुणा, नागरिकों की सुरक्षा, अंतरधार्मिक सद्भाव और मानवता की नैतिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी है ताकि घृणा और प्रतिशोध के अंतहीन चक्र को रोका जा सके।
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद अधिकांश धर्मों में एक समान चिंता दिखाई देती है—बढ़ती हिंसा, ध्रुवीकरण, राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म के दुरुपयोग और लंबे युद्ध के विनाशकारी मानवीय परिणामों का भय। विभिन्न धार्मिक परंपराओं के आध्यात्मिक नेता लगातार चेतावनी देते हैं कि केवल सैन्य शक्ति स्थायी शांति नहीं ला सकती।
वे इस बात पर बल देते हैं कि न्याय, संवाद, पारस्परिक सम्मान, संयम और साझा मानवीय गरिमा की स्वीकृति के बिना यह क्षेत्र अस्थिरता, अविश्वास और लगातार संघर्ष से ग्रस्त रह सकता है।
इन धार्मिक आवाज़ों से उभरने वाला व्यापक संदेश यह है कि आज मानवता एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक मार्ग उग्रवाद, वैचारिक विभाजन, सभ्यतागत टकराव और निरंतर हिंसा की ओर जाता है; जबकि दूसरा मार्ग मेल-मिलाप, सह-अस्तित्व, मानवीय नैतिकता और वैश्विक शांति के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की ओर ले जाता है। इस परस्पर जुड़ी हुई दुनिया में धार्मिक और आध्यात्मिक नेताओं के विचार करोड़ों लोगों को प्रभावित करते हैं और राष्ट्रों को याद दिलाते हैं कि नैतिक बुद्धिमत्ता, करुणा और मानवीय मूल्य किसी भी स्थायी समाधान के केंद्र में होने चाहिए।

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