पारिवारिक मूलà¥à¤¯: सशकà¥à¤¤ समाज की आधारशिला
लेखक: वीरअनिल जैन, जोधपà¥à¤°
आज के तीवà¥à¤° गति से बदलते सामाजिक और आरà¥à¤¥à¤¿à¤• परिवेश में “पारिवारिक मूलà¥à¤¯” केवल à¤à¤• सांसà¥à¤•ृतिक अवधारणा नहीं, बलà¥à¤•ि समाज की सà¥à¤¥à¤¿à¤°à¤¤à¤¾ और पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨à¤¿à¤• सà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ की मूल धà¥à¤°à¥€ हैं। परिवार वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ का पहला विदà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ होता है, जहाठउसे जीवन के मूल सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚त—समà¥à¤®à¤¾à¤¨, अनà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨, सहनशीलता, तà¥à¤¯à¤¾à¤— और जिमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥€—सिखाठजाते हैं। यही मूलà¥à¤¯ आगे चलकर नागरिकों के आचरण और सामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ को निरà¥à¤§à¤¾à¤°à¤¿à¤¤ करते हैं।
घटते पारिवारिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ तसà¥à¤µà¥€à¤°
वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ समय में पारिवारिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ गिरावट देखी जा रही है। शहरीकरण, à¤à¤•ल परिवारों की बढ़ती पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿, और डिजिटल जीवनशैली ने पारिवारिक संवाद को सीमित कर दिया है। पहले जहाठसंयà¥à¤•à¥à¤¤ परिवारों में दादा-दादी की कहानियों और अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ से बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को नैतिक शिकà¥à¤·à¤¾ मिलती थी, वहीं आज मोबाइल और इंटरनेट ने उस सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ को ले लिया है।
उदाहरण के रूप में—
सकारातà¥à¤®à¤• उदाहरण: जहाठपारिवारिक मूलà¥à¤¯ जीवित हैं
हालाà¤à¤•ि, समाज में à¤à¤¸à¥‡ अनेक उदाहरण à¤à¥€ हैं जहाठपारिवारिक मूलà¥à¤¯ आज à¤à¥€ सशकà¥à¤¤ रूप में विदà¥à¤¯à¤®à¤¾à¤¨ हैं—
पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ की à¤à¥‚मिका
इस संदरà¥à¤ में पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ की à¤à¥‚मिका अतà¥à¤¯à¤‚त महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ हो जाती है। केवल कानून-वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ बनाठरखना ही परà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नहीं है, बलà¥à¤•ि सामाजिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के संरकà¥à¤·à¤£ और संवरà¥à¤§à¤¨ में à¤à¥€ सकà¥à¤°à¤¿à¤¯ à¤à¤¾à¤—ीदारी आवशà¥à¤¯à¤• है।
निषà¥à¤•रà¥à¤· :
पारिवारिक मूलà¥à¤¯ किसी à¤à¥€ समाज की आतà¥à¤®à¤¾ होते हैं। यदि ये कमजोर होते हैं, तो समाज में असंतà¥à¤²à¤¨ और अवà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ बढ़ती है, जिसका सीधा पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨à¤¿à¤• तंतà¥à¤° पर à¤à¥€ पड़ता है। अतः यह आवशà¥à¤¯à¤• है कि हम सà¤à¥€—परिवार, समाज और पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨—मिलकर इन मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ को पà¥à¤¨à¤ƒ सà¥à¤¦à¥ƒà¤¢à¤¼ करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करें।
à¤à¤• सà¥à¤¦à¥ƒà¤¢à¤¼ परिवार ही à¤à¤• सशकà¥à¤¤ समाज और समृदà¥à¤§ राषà¥à¤Ÿà¥à¤° की नींव रखता है। यदि हम अपने पारिवारिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ को संजोठरखें, तो न केवल वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤—त जीवन बेहतर होगा, बलà¥à¤•ि पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨à¤¿à¤• वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ à¤à¥€ अधिक पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ और मानवीय बन सकेगी।
लेखक: वीरअनिल जैन, जोधपà¥à¤°
Email : CAINDIA@HOTMAIL.COM
Phone : 9810046108
पारिवारिक मूलà¥à¤¯: सशकà¥à¤¤ समाज की आधारशिला
लेखक: वीरअनिल जैन, जोधपà¥à¤°
आज के तीवà¥à¤° गति से बदलते सामाजिक और आरà¥à¤¥à¤¿à¤• परिवेश में “पारिवारिक मूलà¥à¤¯” केवल à¤à¤• सांसà¥à¤•ृतिक अवधारणा नहीं, बलà¥à¤•ि समाज की सà¥à¤¥à¤¿à¤°à¤¤à¤¾ और पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨à¤¿à¤• सà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ की मूल धà¥à¤°à¥€ हैं। परिवार वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ का पहला विदà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ होता है, जहाठउसे जीवन के मूल सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚त—समà¥à¤®à¤¾à¤¨, अनà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨, सहनशीलता, तà¥à¤¯à¤¾à¤— और जिमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥€—सिखाठजाते हैं। यही मूलà¥à¤¯ आगे चलकर नागरिकों के आचरण और सामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ को निरà¥à¤§à¤¾à¤°à¤¿à¤¤ करते हैं।
घटते पारिवारिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ तसà¥à¤µà¥€à¤°
वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ समय में पारिवारिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ गिरावट देखी जा रही है। शहरीकरण, à¤à¤•ल परिवारों की बढ़ती पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿, और डिजिटल जीवनशैली ने पारिवारिक संवाद को सीमित कर दिया है। पहले जहाठसंयà¥à¤•à¥à¤¤ परिवारों में दादा-दादी की कहानियों और अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ से बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को नैतिक शिकà¥à¤·à¤¾ मिलती थी, वहीं आज मोबाइल और इंटरनेट ने उस सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ को ले लिया है।
उदाहरण के रूप में—
सकारातà¥à¤®à¤• उदाहरण: जहाठपारिवारिक मूलà¥à¤¯ जीवित हैं
हालाà¤à¤•ि, समाज में à¤à¤¸à¥‡ अनेक उदाहरण à¤à¥€ हैं जहाठपारिवारिक मूलà¥à¤¯ आज à¤à¥€ सशकà¥à¤¤ रूप में विदà¥à¤¯à¤®à¤¾à¤¨ हैं—
पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ की à¤à¥‚मिका
इस संदरà¥à¤ में पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ की à¤à¥‚मिका अतà¥à¤¯à¤‚त महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ हो जाती है। केवल कानून-वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ बनाठरखना ही परà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नहीं है, बलà¥à¤•ि सामाजिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के संरकà¥à¤·à¤£ और संवरà¥à¤§à¤¨ में à¤à¥€ सकà¥à¤°à¤¿à¤¯ à¤à¤¾à¤—ीदारी आवशà¥à¤¯à¤• है।
निषà¥à¤•रà¥à¤· :
पारिवारिक मूलà¥à¤¯ किसी à¤à¥€ समाज की आतà¥à¤®à¤¾ होते हैं। यदि ये कमजोर होते हैं, तो समाज में असंतà¥à¤²à¤¨ और अवà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ बढ़ती है, जिसका सीधा पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨à¤¿à¤• तंतà¥à¤° पर à¤à¥€ पड़ता है। अतः यह आवशà¥à¤¯à¤• है कि हम सà¤à¥€—परिवार, समाज और पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨—मिलकर इन मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ को पà¥à¤¨à¤ƒ सà¥à¤¦à¥ƒà¤¢à¤¼ करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करें।
à¤à¤• सà¥à¤¦à¥ƒà¤¢à¤¼ परिवार ही à¤à¤• सशकà¥à¤¤ समाज और समृदà¥à¤§ राषà¥à¤Ÿà¥à¤° की नींव रखता है। यदि हम अपने पारिवारिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ को संजोठरखें, तो न केवल वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤—त जीवन बेहतर होगा, बलà¥à¤•ि पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨à¤¿à¤• वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ à¤à¥€ अधिक पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ और मानवीय बन सकेगी।
लेखक: वीरअनिल जैन, जोधपà¥à¤°
Email : CAINDIA@HOTMAIL.COM
Phone : 9810046108
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