
— श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र मुनि जी म. सा.
समाज की सबसे बड़ी शक्ति यदि कोई है, तो वह उसकी आस्था है। धन, सत्ता, ज्ञान और संसाधन समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन जिस समाज की आस्था जीवंत रहती है, वह समाज हर संकट से उबरने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि मंदिर, स्थानक, तीर्थ, उपाश्रय और अन्य धर्मस्थल केवल ईंट-पत्थरों से निर्मित भवन नहीं होते, बल्कि वे असंख्य श्रद्धालुओं की श्रद्धा, तप, त्याग और विश्वास के जीवंत केंद्र होते हैं।
एक श्रद्धालु जब किसी धर्मस्थल में प्रवेश करता है, तो वह केवल पूजा या दर्शन करने नहीं आता। वह अपने मन की व्यथा, आशा, कृतज्ञता और विश्वास भी वहीं अर्पित करता है। उसकी दक्षिणा केवल मुद्रा नहीं होती; उसमें उसकी मेहनत की कमाई, उसके परिवार की श्रद्धा और धर्म के प्रति उसका समर्पण भी जुड़ा होता है। इसलिए धर्मस्थलों में आने वाला प्रत्येक अंश वास्तव में समाज की अमानत है।
दुर्भाग्य तब उत्पन्न होता है, जब धर्म के नाम पर प्राप्त धन या संसाधनों का उपयोग धर्म के उद्देश्य से हटकर व्यक्तिगत लाभ, वैभव, प्रतिष्ठा अथवा स्वार्थ के लिए होने लगे। यह केवल आर्थिक अनियमितता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि समाज की आस्था और विश्वास से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
जिस धन में हजारों श्रद्धालुओं की भावनाएं जुड़ी हों, उसके उपयोग का प्रश्न केवल कानून या लेखा-जोखा तक सीमित नहीं हो सकता; वह हमारी अंतरात्मा और नैतिकता से भी जुड़ा है। इतिहास हमें बार-बार यह स्मरण कराता है कि अनुचित साधनों से प्राप्त वैभव स्थायी सुख और शांति नहीं दे सकता। छल, विश्वासघात या धार्मिक भावनाओं के अनुचित उपयोग से अर्जित संपत्ति बाहर से भले वैभव का प्रदर्शन करे, लेकिन वह अंतर्मन की शांति का विकल्प नहीं बन सकती।
धर्म के धन के संदर्भ में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उसमें केवल धन नहीं, असंख्य लोगों की श्रद्धा समाहित होती है।
जैन दर्शन के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने मानवता को संयम, सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह का अमूल्य संदेश दिया। इनमें अपरिग्रह का सिद्धांत आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
अपरिग्रह का अर्थ केवल अधिक वस्तुएं न रखना नहीं है। उसका व्यापक अर्थ है—लोभ, स्वार्थ, संग्रह की मानसिकता और अधिकार के दुरुपयोग से स्वयं को मुक्त करना।
यदि धर्म से जुड़े व्यक्ति ही अपरिग्रह की भावना को भूल जाएं और धर्म को संग्रह, प्रभाव अथवा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का माध्यम बना लें, तो भगवान महावीर के संदेश की मूल भावना ही कमजोर पड़ जाती है।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य के अहंकार को बड़ा करना नहीं, बल्कि उसे छोटा करना है।
धर्म हमें अधिकार से पहले उत्तरदायित्व सिखाता है।
संग्रह से पहले समर्पण सिखाता है।
स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा का मार्ग दिखाता है।
धर्मस्थलों का निर्माण और संचालन समाज के सहयोग से होता है। कोई साधारण व्यक्ति अपनी छोटी-सी बचत में से दान देता है, कोई किसान अपनी उपज का अंश अर्पित करता है, तो कोई व्यापारी अपनी आय का हिस्सा धर्मकार्य में लगाता है।
सभी के मन में एक ही भावना होती है—धर्म जीवंत रहे, संस्कृति सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियां भी इन मूल्यों से जुड़ी रहें।
ऐसे में यदि उस विश्वास को ठेस पहुंचती है, तो आहत केवल एक व्यक्ति नहीं होता; पूरे समाज की भावना प्रभावित होती है। इसलिए धार्मिक संस्थाओं और उनके संसाधनों का संचालन केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक पवित्र नैतिक दायित्व भी है।
आज आवश्यकता किसी पर आरोप लगाने या विवाद बढ़ाने की नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की है। धर्मस्थलों का संचालन पूर्ण पारदर्शिता, ईमानदारी और उत्तरदायित्व के साथ होना चाहिए।
आय-व्यय का स्पष्ट लेखा-जोखा, समाज के प्रति जवाबदेही और धर्म के उद्देश्यों के अनुरूप संसाधनों का उपयोग—ये केवल अच्छी प्रशासनिक व्यवस्थाएं नहीं हैं, बल्कि धार्मिक मर्यादा का अनिवार्य हिस्सा भी हैं।
समाज को भी यह समझना होगा कि धर्म की रक्षा केवल दान देने से नहीं होती; धर्म की मर्यादाओं और संस्थाओं में विश्वास की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है।
जहां पारदर्शिता होती है, वहां विश्वास बढ़ता है।
जहां विश्वास बढ़ता है, वहीं धर्म फलता-फूलता है।
यदि कहीं कोई त्रुटि दिखाई दे, तो उसका समाधान भी धर्मसम्मत, संयमित, तथ्यपूर्ण और संवाद के माध्यम से होना चाहिए। कटुता, व्यक्तिगत आरोप और वैमनस्य किसी धार्मिक वातावरण को शुद्ध नहीं कर सकते। सुधार का मार्ग सत्य से निकले, लेकिन उसकी भाषा संयम की हो।
हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि व्यक्ति से बड़ा धर्म है, पद से बड़ी मर्यादा है और संस्था से बड़ी आस्था है।
व्यक्ति बदल सकते हैं।
पदाधिकारी बदल सकते हैं।
व्यवस्थाएं भी बदल सकती हैं।
लेकिन धर्म की प्रतिष्ठा और समाज का विश्वास अक्षुण्ण रहना चाहिए।
भगवान महावीर का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा वैभव संग्रह में नहीं, त्याग में है; अधिकार में नहीं, उत्तरदायित्व में है; और बाहरी संपत्ति में नहीं, अंतःकरण की निर्मलता में है।
यही संदेश आज प्रत्येक धार्मिक संस्था, प्रत्येक पदाधिकारी और प्रत्येक श्रद्धालु के लिए समान रूप से प्रासंगिक है।
आइए, संकल्प लें कि धर्म को कभी स्वार्थ का साधन नहीं बनने देंगे।
मंदिर, स्थानक, तीर्थ और उपाश्रय केवल भवन नहीं हैं; वे हमारी सामूहिक आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक हैं। उनकी पवित्रता, पारदर्शिता और मर्यादा की रक्षा करना हम सभी का नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है।
क्योंकि धर्म का धन किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं—समाज की श्रद्धा की अमानत है।
और अमानत का सबसे बड़ा धर्म है—
उसकी पवित्रता और विश्वास की रक्षा।
जब धर्म की मर्यादा सुरक्षित रहेगी, तभी समाज सुदृढ़ रहेगा; और जब आस्था सुरक्षित रहेगी, तभी संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रहेगी।
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