परà¥à¤¯à¥à¤·à¤£ - विकृतियों को जीतने का परव
डॉ. सà¥à¤¨à¥€à¤² जैन 'संचय', जैन संसà¥à¤•ृति के अधà¥à¤¯à¥‡à¤¤à¤¾
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शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤‚बर परंपरा के जैन मतावलंबी 3 से 10 सितंबर तक व दिगंबर परंपरा के मतावलंबी इसे 10 से 19 सितंबर तक यह महापरà¥à¤µ मनाà¤à¤‚गे। संयम और आतà¥à¤®à¤¶à¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ के इस पवितà¥à¤° परà¥à¤µ पर जिनेनà¥à¤¦à¥à¤° à¤à¤—वान की पूजा, अà¤à¤¿à¤·à¥‡à¤•, शांतिधारा, विधान, जप, उपवास, पà¥à¤°à¤µà¤šà¤¨ शà¥à¤°à¤µà¤£ आदि दस दिन तक किया जाता है। जैन मंदिरों को सजाया जाता है। कठिन वà¥à¤°à¤¤ नियमों का पालन किया जाता है।
परà¥à¤¯à¥à¤·à¤£ परà¥à¤µ कà¥à¤°à¥‹à¤§, मान, माया, लोठआदि विकारों से बचकर संयमपूरà¥à¤µà¤• धरà¥à¤® की आराधना करने का अवसर देता है। यह परà¥à¤µ हमारे जीवन के परिवरà¥à¤¤à¤¨ में कारण बन सकता है। यह हमारी आतà¥à¤®à¤¾ की कालिमा को धोने का काम करता है। विकृति का विनाश और विशà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ का विकास इस परà¥à¤µ का धà¥à¤¯à¥‡à¤¯ है। दस दिन चलने वाले इस परà¥à¤µ में पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨ धरà¥à¤® के à¤à¤• अंग को जीवन में उतारने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया जाता है। इसलिठइसे दसलकà¥à¤·à¤£ परà¥à¤µ à¤à¥€ कहा जाता है। जिन दस धरà¥à¤®à¥‹à¤‚ की आराधना की जाती हैं वे इस पà¥à¤°à¤•ार हैं :
1. उतà¥à¤¤à¤® कà¥à¤·à¤®à¤¾ : उतà¥à¤¤à¤® कà¥à¤·à¤®à¤¾ की आराधना से परà¥à¤¯à¥à¤·à¤£ परà¥à¤µ का आरंठहोता है। सहनशीलता का विकास इसका उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ है। सà¤à¥€ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ कà¥à¤·à¤®à¤¾à¤à¤¾à¤µ रखना।
2. उतà¥à¤¤à¤® मारà¥à¤¦à¤µ,: चितà¥à¤¤ में मृदà¥à¤¤à¤¾ व वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° में नमà¥à¤°à¤¤à¤¾ होना। सà¤à¥€ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ विनयà¤à¤¾à¤µ रखना।
3. उतà¥à¤¤à¤® आरà¥à¤œà¤µ : à¤à¤¾à¤µ की शà¥à¤¦à¥à¤§à¤¤à¤¾à¥¤ जो सोचना सो कहना। जो कहना, वही करना। छल, कपट का तà¥à¤¯à¤¾à¤— करना। कथनी और करनी में अंतर नहीं करना।
4. उतà¥à¤¤à¤® शौच : मन में किसी à¤à¥€ तरह का लोठन रखना। आसकà¥à¤¤à¤¿ घटाना। नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ नीति पूरà¥à¤µà¤• कमाना।
5. उतà¥à¤¤à¤® सतà¥à¤¯ : सतà¥à¤¯ बोलना। हितकारी बोलना। थोड़ा बोलना। पà¥à¤°à¤¿à¤¯ और अचà¥à¤›à¥‡ वचन बोलना।
6. उतà¥à¤¤à¤® संयम : मन, वचन और शरीर को काबू में रखना। संयम का पालन करना।
7. उतà¥à¤¤à¤® तप : मलिन वृतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को दूर करने के लिठतपसà¥à¤¯à¤¾ करना। तप का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤œà¤¨ मन की शà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ है।
8. उतà¥à¤¤à¤® तà¥à¤¯à¤¾à¤— : सà¥à¤ªà¤¾à¤¤à¥à¤° को जà¥à¤žà¤¾à¤¨, अà¤à¤¯, आहार और औषधि का दान देना तथा राग-दà¥à¤µà¥‡à¤·à¤¾à¤¦à¤¿ का तà¥à¤¯à¤¾à¤— करना।
9. उतà¥à¤¤à¤® आकिंचन : अपरिगà¥à¤°à¤¹ को सà¥à¤µà¥€à¤•ार करना।
10. उतà¥à¤¤à¤® बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤šà¤°à¥à¤¯ : सदà¥à¤—à¥à¤£à¥‹à¤‚ का अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ करना और पवितà¥à¤° रहना। चिदानंद आतà¥à¤®à¤¾ में लीन होना।।
आज à¤à¥Œà¤¤à¤¿à¤•ता की अंधी दौड़ में यह परà¥à¤µ जिंदगी को जीने का नया मारà¥à¤— पà¥à¤°à¤¶à¤¸à¥à¤¤ करता है। यह परà¥à¤µ हमारी चेतना पर सà¥à¤¸à¤‚सà¥à¤•ार डालता है आतà¥à¤®à¤œà¤¾à¤—रण में सहायक बनता है। इस परà¥à¤µ का महतà¥à¤µ तà¥à¤¯à¤¾à¤— के कारण है, आमोद-पà¥à¤°à¤®à¥‹à¤¦ का इस परà¥à¤µ में कोई सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ नहीं है। संसà¥à¤•ारों को सà¥à¤¦à¥ƒà¤¢à¤¼ बनाने और अपसंसà¥à¤•ारों को तिलांजलि देने का यह अपूरà¥à¤µ अवसर होता है।
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