वर्तमान समय में महावीर के सिद्धांतों का प्रासंगिकता
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धर्म शताब्दीयों और मानवीय जीवन को अनुप्राणित करता रहा है। जितने भी धार्मिक संप्रदाय विकसित हुऐ, उनमें जैन-धर्म अति विशिष्ट स्थान रखता है। जैन धर्म के 24वें तीर्थकर भगवान महावीर एक जाज्वल्यमान तीर्थकर के रूप में, विश्व की महान विभूति कहलाये।
जिस समय महावीर का आविर्भाव हुआ, उस समय देश विचित्र हालात से गुजर रहा था। धर्म के नाम पर, नर एवं पशुओं की बली दी जाती थी। स्त्री और शूद्र जाति को शास्त्र पढ़ने का अधिकार नहीं था। जातिवाद प्रभावी था। धर्म गुणात्मक न रहकर व्यक्तिपूजक एवं व्यर्थ के क्रियाकाण्डो से विकृत होता जा रहा था। मानवीय दास प्रथा प्रचलित थी। ऐसे विचित्र वातावरण के बीच भगवान महावीर ने, कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ के घर में, माता त्रिशलारानी के गर्भ से जन्म लिया। सुख-सुविधाओं एवं ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं होने पर भी, महावीर ने, अपने अन्तर्मन में वेदना और रिकृता का अनुभव किया। इसी कारण आपने, सब कुछ त्याग कर पूर्ण साधनामय जीवन स्वीकार कर लिया और साढ़े बारह वर्ष की कठोर साधना से केवल ज्ञान की प्राप्ति की।
महावीर ने जैन धर्म को नई दिशा दी। महावीर का साहित्य हो या श्लोक, पत्थर पर खुदे आलेख हो या चित्रित मुद्राए पवित्रा मंत्र हो या भावपूर्ण भजन, मानव विकास एवं कल्याण में सदैव पथ-प्रदर्शक रहेगें।
महावीर ने ‘’अहिसा’’ और पृथ्वी के सभी जीवो पर दया रखने का संदेश दिया। ‘’जीयो और जीने दो‘’ जैन धर्म के मूलमंत्र है। इस एक मंत्र से, विश्व की सभी समस्याओं का निराकरण हो सकता है और सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक भेदभाव और शोषण से मुक्ति मिल सकती है। जैन धर्म में अहिसा, कायरों शास्त्र नहीं वरन् वीरों का भूषण है। ‘’सर्वे भवन्तु सुखिनः‘’ की मंगल भावना, अहिसा के अमूल्य विचार है, जो विश्व में शांति एवम् सद्भाव स्थापित कर सकते हैं।
महावीर ने मांसाहार का विरोध कर, शाकाहार को हर दृष्टि से लाभप्रद बताया। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो भी, मांसाहार शरीर एवं मन दोनों के लिए प्राण घातक है और मनुष्य में हिंसक प्रवृति को जन्म देता है। उच्च रक्त-चाप, मधुमेह, हृदय रोग जैसे गंभीर बीमारियां विकसित होती है। महात्मा गांधी, पं जवाहर लाल नेहरू, विनोबाभावे जैसे महान व्यक्ति भी महावीर के सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित थे। नेहरू जी ने, विश्व शान्ति के लिये पंचशील सिद्धांतों की रचना में जैन सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। प्रसिद्ध दार्शनिक, जार्ज बर्नाड शां पक्के शाकाहारी थे। उनका कहना था, मेरा पेट, पेट है, कोई कब्रिस्तान नहीं, जहां मुर्दों को स्थान दिया जाय। आप जैन धर्म से अत्यधिक प्रभावित थे। अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त करते हुए, उन्होंने कहा, यदि मेरा पुर्नजन्म हो, तो भारत में हो और जैन कूल में हो।
“सत्य” महावीर द्वारा बताया गया, जैन धर्म महत्वपूर्ण सूत्र है। प्रत्येक व्यक्ति का चिंतन, मनन और विचार सत्य पर आधारित होने चाहिये। सत्य ही मानव को जीभ से शिव, नर से नारायण, आत्मा से परमात्मा बनने की शक्ति देता है। आज मनुष्य के स्वभाव में, व्यवहार में, बोलचाल में, कार्यशैली में झूठ का स्थान है। राजनीतिज्ञ, शासक, व्यापारी सभी वास्तविकता से हटकर, असत्य के सहारे, अपने स्वार्थ पूर्ति में लगे हैं। और देश को गर्त में धकेल रहे हैं। सत्य जो हमारा स्वभाविक एवं सहज गुण है, जो स्वतः ही प्रस्फुटित होता है, उसे हम त्याग रहे हैं। महावीर के विचार में, सत्य एवं अहिंसा से कोई राष्ट्र शांति एवं निर्भयता से प्रत्येक समस्या का समाधान कर सकता है।
महावीर का अनेकांतवाद अथवा स्यादवाद का सिद्धांत भी सत्य पर आधारित है। महावीर ने कहा था, किसी भी वस्तु या घटना को एक नहीं वरन् अनंत दृष्टिकोणों से देखने की आवश्यकता है। आज समाज में झगड़े, विवाद आदि एंकागी दृष्टिकोण को लेकर होते हैं, यदि विवाद के समस्त पहलुओं को समझा जाय, निथ्या अंशों को छोड़, सत्याशों को पकड़ा जाय तो सम्भवतः संघर्ष कम हो जाय। वैज्ञानिक आईस्टीन का सापेक्षवाद महावीर के अनेकान्तवाद पर ही टिका है।
आज के युग में, मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है, महावीर के अपरिग्रह के सिद्धांतों को समझने की। संग्रह अशांति का अग्रदूत है, विनाश, विषमता तथा अनेक समस्याओं को जन्म देता है। कार्ल मार्क्स का साम्यवाद इस रोग की दवा नहीं, क्योंकि हिंसा से हिंसा शांत नहीं होती। महावीर का अपरिगृह का विचार ही, इसकी संजीवनी है जो अमीर गरीब की दूरी कम कर सामाजिक समता स्थापित कर सकती है।
महावीर के उपदेशों में, यदि अचौर्य के सिद्धान्त का अनुकरण किया जाए तो, आज विश्व में व्याप्त भ्रष्टाचार व काले धन पर अंकुश लगाया जा सकता है।
महावीर ने, स्त्रियों को पूर्णतः स्वतंत्र और स्वावलम्बी बताया। आज स्त्रियों के समान अधिकार एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता हेतु महावीर के विचार आज भी सार्थक है।
महावीर द्वारा बताये जैन धर्म के सूत्रों में, एक महत्वपूर्ण सूत्र ब्रह्मचर्य है। आज के भोगवादी पाश्चात्य युग में इससे बढ़कर कोई त्याग नहीं। इससे बढ़ती जनसंख्या के दुष्प्रभावों से बच सकेंगे। निर्धनता, बेरोजगारी, भिक्षावृत्ति, आवास, निवास, अपराध, बाल अपराध आदि समस्याओं का निराकरण होगा तथा एड्स जैसी महामारी को विश्व में विकराल रूप धारण करने से रोक पाएंगे।
महावीर ने तन-मन की शुद्धि तथा आत्म बल बढ़ाने हेतु, साधना एवं तपश्चर्या पर बल दिया। आज के भौतिकवादी युग में जहां खानपान की अशुद्धता एवं अनियमितता है, और जीवन तनावयुक्त है, महावीर द्वारा बताई तप, त्याग एवं साधनामय जीवन-शैली ही समस्याओं का समाधान है।
महावीर के सिद्धांत, न केवल सामाजिक, आत्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में, वरन राजनीति क्षेत्र में भी अत्याधिक सार्थक एवं प्रासंगिक है। महावीर का ‘’अहिंसा‘’ का दिव्य संदेश, स्वार्थ प्रवृति एवं संकीर्ण मनोवृति को विराम दे सकता है, चुनावी हिंसा और आंतक के तांडव नृत्य को रोक सकता है। ‘’सत्य‘’ का आचरण घोटालों में लिप्त राजनेताओं एवं नौकरशाहों को राष्ट्रहित की प्रेरणा दे सकता है। ‘’अचौर्य‘’ और ‘’अपरिगृह‘’ का संदेश, भ्रष्टाचार एवं कालाबाजारी को रोक, सामाजिक विषमता को कम कर सकता है। ‘’जीयो एंव जीने दो‘’ का सिद्धांत, आपसी बैरभाव और कटुता को कम कर सकता है। महावीर के अनेकान्तवाद के सच्चे प्रयोग से चुनाव में व्याप्त साम्प्रदायिकता एवं कट्टरता के भूत को भगाया जा सकता है।
महावीर के सिद्धांत किसी विशिष्ट समाज, विशेष समय या परिस्थिति के लिए नहीं थे, वरन् सार्वभौमिक थे। महावीर के सिद्धान्तों की रजन धवल ज्योत्सना ही विश्व कल्याण कर सकती है। महावीर की आत्मा के, अमावस्या की रात्रि सर्वकर्म मुक्त हो शाश्वत सिद्धि प्राप्त करने पर, घर-घर में दीप जलाकर उनकी मृत्यु को भी महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। दीपक कि वही ज्योति, सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित कर सकेगी, यदि व्यक्ति राग-द्वेष, ईष्र्या, स्वार्थ एवं साम्प्रदायिकता से ऊपर उठकर, विज्ञान एवं अध्यात्म के समन्वय की ओर ले जाने वाली राह को अपनायें।
महावीर का दर्शन सभी के लिये जीवन्त दर्शन है। इसके अभाव में ज्ञानी का ज्ञान, पंडित का पांडित्य, विद्वान की विद्वता, भक्तों की भक्ति, अहिंसकों की अहिंसा, न्यायाधीश का न्याय, राजनेताओं की राजनीति, चिन्तकों का चिन्तन, और कवि का काव्य अधूरा है। महावीर के सिद्धांतों को अस्वीकारना पूर्णत: गलत होगा क्योंकि उनके दर्शन में अहिंसा, अनेकान्त, अपरिग्रह का समग्र दर्शन है जो शाश्वत सत्य की आधारशीला पर प्रारूपित किया गया है।
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लेखक : अनिल कुमार जैन
अध्यक्ष
अहिंसा फाउंडेशन
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