
यह आग सिर्फ़ होटल में नहीं लगी थी,
यह आग उन फाइलों में लगी थी,
जहाँ नोटों की गर्मी में
सुरक्षा के नियम जल गए थे।
यह आग उन मेज़ों पर लगी थी,
जहाँ हस्ताक्षर बिकते हैं,
जहाँ निरीक्षण की रिपोर्टें
सच्चाई नहीं,
सुविधा के अनुसार लिखी जाती हैं।
इक्कीस लोग मरे हैं!
नहीं,
इक्कीस लोग नहीं मरे—
इक्कीस सपने मरे हैं,
इक्कीस परिवार उजड़े हैं,
इक्कीस संसार राख हुए हैं।
और अब फिर वही होगा…
कुछ आँसू,
कुछ भाषण,
कुछ मुआवज़े,
कुछ जाँच समितियाँ,
कुछ निलंबन,
और फिर…
सब कुछ सामान्य!
जब तक अगली आग न लग जाए।
पूछो उन कुर्सियों से,
जिन पर बैठकर
कर्तव्य सो गया था।
पूछो उन अधिकारियों से,
जिनकी आँखों के सामने
नियमों का गला घोंटा गया।
पूछो उन भ्रष्ट हाथों से,
जिन्होंने चंद सिक्कों के लिए
मौत को लाइसेंस दे दिया।
आख़िर कब तक?
कब तक नागरिक जलते रहेंगे
और फाइलें बचती रहेंगी?
कब तक बच्चों की चीखें
सायरनों में दबती रहेंगी?
कब तक हर त्रासदी के बाद
जिम्मेदारी का कोई मालिक नहीं मिलेगा?
दिल्ली!
तुम केवल शोक मत करो,
क्रोध भी करो।
भारत के शहरों!
इसे केवल समाचार मत समझो,
इसे चेतावनी समझो।
हर होटल,
हर अस्पताल,
हर विद्यालय,
हर सार्वजनिक भवन से पूछो—
क्या सुरक्षा सचमुच मौजूद है,
या केवल कागज़ों पर दर्ज है?
आज इक्कीस लोग गए हैं,
कल संख्या कोई और हो सकती है।
जब व्यवस्था सो जाती है,
तो आग केवल इमारतों को नहीं जलाती,
वह राष्ट्र के विश्वास को भी जला देती है।
और इतिहास गवाह है—
आग से बड़ा अपराध
आग नहीं होती,
बल्कि वह लापरवाही होती है
जो उसे जन्म देती है।
आज शोक है,
कल न्याय होना चाहिए।
क्योंकि यदि इस बार भी
दोषी बच गए,
तो राख से उठता धुआँ
हम सब से यही पूछेगा—
“मरे कौन थे?
वे इक्कीस लोग,
या फिर हमारी संवेदनाएँ?”
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