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पर्यूषण और दश लक्षण: जैन परंपरा में क्षमा और आध्यात्मिक नवीनीकरण के पवित्र पर्व

Prayushan and dash Lakshan

By: CA  Anil K. Jain
President – Ahimsa Foundation India
Email: CAINDIA@HOTMAIL.COM

परिचय

जैन परंपरा में वर्ष के दो सबसे महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से गहन पर्व पर्यूषण पर्व और दश लक्षण पर्व हैं। ये पर्व जैन धार्मिक परंपरा के शिखर का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह ऐसा पवित्र समय है, जब जैन समुदाय गहन आध्यात्मिक साधना, आत्मनिरीक्षण और आत्मा की शुद्धि के लिए एकजुट होता है।

सामान्यतः संसार के अनेक त्योहार उत्सव, भोजन और आनंद से जुड़े होते हैं, लेकिन पर्यूषण और दश लक्षण का स्वरूप इससे भिन्न है। ये पर्व आध्यात्मिक उत्थान, आत्म-अनुशासन, तप, त्याग, क्षमा और आंतरिक सद्गुणों के विकास के लिए समर्पित हैं।

अर्थ और महत्व

पर्यूषण

पर्यूषण शब्द का शाब्दिक अर्थ है—“निवास करना” या “एक साथ आना”। यह एक शाश्वत पर्व है, जो किसी विशेष व्यक्ति अथवा ऐतिहासिक घटना से संबंधित नहीं है। यह आत्मा के स्वाभाविक गुणों का चिंतन और अनुभव करने का समय है।

यह पर्व जैन वर्ष के समापन का भी प्रतीक है और जैन धर्मावलंबियों को पिछले बारह महीनों में अपने विचारों, वचनों और कर्मों पर चिंतन करने तथा नए वर्ष की शुरुआत से पहले आत्मशुद्धि का अवसर प्रदान करता है।

दश लक्षण

दश लक्षण का अर्थ है—“दस धार्मिक गुणों का पर्व”। यह आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक दस सार्वभौमिक सद्गुणों की आराधना का पर्व है।

यह अवधि मन, वचन और कर्म से इन गुणों का पालन करने, उन पर चिंतन करने तथा उन्हें अपने जीवन में उतारने के लिए समर्पित होती है।

विभिन्न संप्रदायों द्वारा आचरण

जैन पर्वों के आचरण में दो प्रमुख संप्रदायों के बीच महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है—

  • श्वेताम्बर जैन आठ दिनों तक पर्यूषण पर्व मनाते हैं।
  • दिगम्बर जैन इस पर्व को दस दिनों तक मनाते हैं और इसे दश लक्षण पर्व कहा जाता है।

उत्तरी अमेरिका और दुनिया के कई अन्य हिस्सों में जैन समुदाय दोनों आयोजनों को लगातार 18 दिनों की अवधि में भी मनाते हैं—पहले आठ दिन पर्यूषण और उसके बाद दस दिन दश लक्षण।

ये पर्व भाद्रपद माह, अर्थात अगस्त–सितंबर के दौरान आते हैं। यह वर्षा ऋतु का समय होता है। ऐतिहासिक रूप से इसका विशेष महत्व है, क्योंकि वर्षा ऋतु में जैन साधु-साध्वियां विहार कम या बंद कर एक स्थान पर निवास करते हैं, जिससे वर्षा के दौरान उत्पन्न होने वाले छोटे जीव-जंतुओं की हिंसा से बचा जा सके।

इस अवधि में साधु-साध्वियों की एक स्थान पर उपस्थिति के कारण श्रावक-श्राविकाओं को उनके सान्निध्य में धर्म-शिक्षा, प्रवचन और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करने का विशेष अवसर मिलता है।

2026 की तिथियां

वर्ष 2026 में इन पर्वों की तिथियां इस प्रकार हैं—

  • श्वेताम्बर पर्यूषण: 8–15 सितंबर, 2026
  • दिगम्बर दश लक्षण: 16–25 सितंबर, 2026

मुख्य अनुष्ठान और आचरण

उपवास (तप)

पर्यूषण और दश लक्षण के दौरान उपवास अर्थात तप प्रमुख धार्मिक आचरणों में से एक है। उपवास की अवधि और उसकी कठिनता व्यक्ति की क्षमता, श्रद्धा और संकल्प के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

  • संपूर्ण उपवास (अनशन): कुछ श्रद्धालु आठ अथवा दस दिनों तक पूर्ण उपवास करते हैं और केवल उबला हुआ पानी ग्रहण करते हैं।
  • आंशिक उपवास: कुछ लोग दिन में एक बार भोजन अर्थात एकासन अथवा सीमित भोजन करते हैं।
  • अठाई तप: लगातार आठ दिनों तक उपवास।
  • अठम् तप: लगातार तीन दिनों तक उपवास।

श्वेताम्बर परंपरा में उपवास करने वाले अनेक श्रद्धालु निर्धारित समय के भीतर केवल उबला हुआ पानी ग्रहण करते हैं। कुछ तपस्वी 30 दिन अथवा उससे भी अधिक अवधि के उपवास का संकल्प भी लेते हैं।

आहार प्रतिबंध

जो श्रद्धालु पूर्ण उपवास नहीं करते, वे भी इस अवधि में आहार संबंधी विशेष नियमों और मर्यादाओं का पालन करते हैं। जैन धर्मावलंबी सामान्यतः शाकाहारी आहार का पालन करते हैं, लेकिन इन पर्वों के दौरान आहार में अतिरिक्त संयम रखा जाता है।

  • कई श्रद्धालु हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं करते।
  • आलू, प्याज और लहसुन जैसी जड़ वाली सब्जियों से परहेज किया जाता है।
  • धनिया, अदरक और नींबू जैसे खाद्य पदार्थ भी अनेक परंपराओं में इस अवधि के दौरान वर्जित माने जाते हैं।
  • बड़ी संख्या में श्रद्धालु सूर्यास्त के बाद भोजन ग्रहण नहीं करते।

इन आहार नियमों के पीछे मूल भावना जीवों के प्रति अहिंसा, इंद्रिय-संयम और भोजन के प्रति आसक्ति को कम करना है।

प्रतिक्रमण : पाप-स्वीकारोक्ति और आत्मनिरीक्षण

प्रतिक्रमण पर्यूषण की अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक साधनाओं में से एक है। यह अपने दोषों को स्वीकार करने, पश्चाताप करने, आत्मनिरीक्षण करने और स्वयं के आचरण का चिंतन करने की प्रक्रिया है।

पर्यूषण के दौरान प्रतिक्रमण प्रातः और सायंकाल किया जाता है। इस साधना में प्रमुख रूप से शामिल हैं—

  1. सामायिक: समभाव की अवस्था में रहने का अभ्यास।
  2. पवित्र मंत्रों का पाठ: इसमें नवकार मंत्र—अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधुओं को नमस्कार—तथा लोगस्स आदि का पाठ सम्मिलित है।
  3. पाप-स्वीकारोक्ति: अपने द्वारा हुई त्रुटियों और अपराधों को स्वीकार कर उनके लिए पश्चाताप करना।

संवत्सरी प्रतिक्रमण

संवत्सरी प्रतिक्रमण पर्यूषण के अंतिम दिन किया जाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण वार्षिक प्रतिक्रमण है।

इस अवसर पर श्रद्धालु—

  • व्रतों और धार्मिक मर्यादाओं के उल्लंघन पर आत्मचिंतन करते हैं।
  • संसार के सभी जीवों से क्षमा मांगते हैं।
  • विचार, वचन और कर्म से जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए पश्चाताप करते हैं।

इस प्रकार संवत्सरी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूरे वर्ष के जीवन और व्यवहार का आध्यात्मिक आत्मपरीक्षण भी है।

मिच्छामि दुक्कड़म्

संवत्सरी प्रतिक्रमण के पश्चात जैन धर्मावलंबी एक-दूसरे से “मिच्छामि दुक्कड़म्” कहकर क्षमायाचना करते हैं।

इसका भाव है—

“यदि मैंने आपको किसी भी प्रकार से, जाने-अनजाने, मन, वचन या कर्म से ठेस पहुंचाई हो, तो मैं आपसे क्षमा चाहता हूं।”

यह केवल औपचारिक अभिवादन नहीं है, बल्कि विनम्रता, क्षमा और मेल-मिलाप की एक गहन आध्यात्मिक प्रक्रिया है।

जैन परंपरा में व्यक्ति केवल क्षमा मांगता ही नहीं, बल्कि दूसरों को हृदय से क्षमा करने का भी प्रयास करता है। यह भावना परिवार अथवा जैन समाज तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मित्रों, सहकर्मियों और यहां तक कि जिनसे मतभेद हों, उनके प्रति भी विस्तृत होती है।

शास्त्रों का अध्ययन

कल्प सूत्र — श्वेताम्बर परंपरा

पर्यूषण के दौरान कल्प सूत्र का सार्वजनिक वाचन श्वेताम्बर परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है।

इस पवित्र ग्रंथ में मुख्य रूप से—

  • तीर्थंकरों के जीवन चरित्र, विशेष रूप से भगवान महावीर के जीवन का वर्णन,
  • भगवान महावीर की माता त्रिशला द्वारा देखे गए चौदह स्वप्न,
  • पर्यूषण के नियम और आचरण

आदि का वर्णन मिलता है।

पर्यूषण के दौरान कल्प सूत्र का विधिपूर्वक वाचन किया जाता है। कई स्थानों पर शास्त्र को विशेष सम्मान के साथ लाया जाता है और साधु-साध्वियों द्वारा श्रद्धालुओं के समक्ष इसका वाचन तथा विवेचन किया जाता है।

तत्त्वार्थ सूत्र — दिगम्बर परंपरा

दिगम्बर परंपरा में दश लक्षण पर्व के दौरान तत्त्वार्थ सूत्र का अध्ययन और पाठ महत्वपूर्ण माना जाता है।

दस दिनों की इस अवधि में धर्म के दस उत्तम लक्षणों का चिंतन किया जाता है और प्रत्येक दिन एक विशिष्ट सद्गुण की आराधना को समर्पित होता है।

मंदिर दर्शन और समारोह

पर्यूषण के दौरान चैत्य परिपाटी, अर्थात स्थानीय जैन मंदिरों के दर्शन और भ्रमण की परंपरा का भी विशेष महत्व है।

मंदिरों को सुंदर ढंग से सजाया जाता है और तीर्थंकर भगवान की प्रतिमाएं श्रद्धा एवं आराधना का केंद्र बनती हैं।

पर्यूषण के दौरान भगवान महावीर के जन्म से संबंधित प्रसंगों का वाचन और विशेष धार्मिक आयोजन भी किए जाते हैं। महावीर जन्म वांचन का आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जाता है।

दश लक्षण के दस सद्गुण

दश लक्षण का प्रत्येक दिन दस परम सद्गुणों (उत्तम धर्म) में से एक के चिंतन और अभ्यास के लिए समर्पित है:

दिन

सद्गुण (संस्कृत)

अर्थ

1

उत्तम क्षमा

परम क्षमा / सहिष्णुता

2

उत्तम मार्दव

परम नम्रता / विनम्रता

3

उत्तम आर्जव

परम सरलता / ईमानदारी

4

उत्तम शौच

परम पवित्रता / संतोष

5

उत्तम सत्य

परम सत्यनिष्ठा

6

उत्तम संयम

परम आत्म-संयम

7

उत्तम तप

परम तपस्या / संयम

8

उत्तम त्याग

परम त्याग

9

उत्तम आकिंचन्य

परम अनासक्ति

10

उत्तम ब्रह्मचर्य

परम ब्रह्मचर्य / शुद्धाचरण

प्रत्येक गुण को केवल उसके विपरीत दोष की अनुपस्थिति के रूप में नहीं, बल्कि आत्मा की वास्तविक प्रकृति की अभिव्यक्ति के रूप में समझा जाता है।

इनमें प्रथम गुण उत्तम क्षमा है। भारतीय चिंतन में कहा गया है—

“क्षमा वीरस्य भूषणम्”

अर्थात क्षमा वीरों का आभूषण है। भगवान महावीर और भगवान पार्श्वनाथ का जीवन भी कठिन से कठिन परिस्थितियों में क्षमा और समता के उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

सामायिक

सामायिक अर्थात समभाव की साधना पर्यूषण और दश लक्षण दोनों के दौरान महत्वपूर्ण धार्मिक अभ्यास है।

इसमें व्यक्ति कुछ समय के लिए सांसारिक गतिविधियों और आसक्तियों से स्वयं को अलग करके समता, आत्मचिंतन और आत्मा के वास्तविक स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करता है।

सुगंध दशमी

दश लक्षण पर्व के दौरान दिगम्बर परंपरा में सुगंध दशमी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस अवसर पर श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आराधना करते हैं।

अनंत चतुर्दशी

दश लक्षण पर्व अनंत चतुर्दशी के अवसर पर पूर्ण होता है। यह शुक्ल पक्ष की चौदहवीं तिथि होती है।

जैन परंपरा में यह दिन भगवान वासुपूज्य, बारहवें तीर्थंकर, से भी संबंधित माना जाता है। इस अवसर पर विशेष पूजा, उपवास और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। अनेक नगरों में जैन मंदिरों तक धार्मिक शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं।

पारणा : उपवास का समापन

उपवास पूर्ण होने के पश्चात पारणा किया जाता है। पारणा उपवास समाप्त करने की विधिपूर्वक धार्मिक प्रक्रिया है।

जिन तपस्वियों ने दीर्घ अवधि तक उपवास किया होता है, उनके पारणे का आयोजन परिवार, मित्रों और समाज के लोगों द्वारा श्रद्धापूर्वक किया जाता है।

यह केवल भोजन ग्रहण करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि तपस्या के सफल समापन के प्रति सम्मान और अनुमोदना का अवसर भी होता है।

आध्यात्मिक लक्ष्य और लाभ

पर्यूषण और दश लक्षण का अंतिम उद्देश्य आध्यात्मिक शुद्धि है।

उपवास, तप, शास्त्रों के अध्ययन, प्रतिक्रमण, सामायिक और क्षमा के अभ्यास के माध्यम से जैन धर्मावलंबियों का लक्ष्य होता है—

  1. आत्मा को कार्मिक अशुद्धियों से शुद्ध करना।
  2. इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हुए भौतिक आकर्षणों से विरक्ति विकसित करना।
  3. आंतरिक सद्गुणों का विकास करना और आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ना।
  4. उच्चतम स्तर पर अहिंसा का पालन करना।
  5. सभी जीवों से क्षमा मांगना और उन्हें क्षमा करना, जिससे सद्भाव और आंतरिक शांति विकसित हो।

दश लक्षण के दस उत्तम धर्म संवर, अर्थात नए कर्मों के आगमन को रोकने, और निर्जरा, अर्थात संचित कर्मों के क्षय की आध्यात्मिक प्रक्रिया से भी जुड़े हैं। ये आत्मा की मुक्ति के मार्ग पर अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

निष्कर्ष

पर्यूषण और दश लक्षण जैन आध्यात्मिक साधना के सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये केवल धार्मिक त्योहार नहीं हैं, बल्कि आध्यात्मिक नवीनीकरण, आत्मशुद्धि, आत्मनिरीक्षण और उच्च सद्गुणों के विकास के गहन अवसर हैं।

उपवास, तप, प्रतिक्रमण, शास्त्र-अध्ययन और क्षमा की साधना मनुष्य को सांसारिक आकर्षणों और विकर्षणों से हटाकर आत्मा के आंतरिक गुणों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।

जब दुनिया भर के जैन इन पवित्र दिनों की आराधना करते हैं, तब वे सदाचारी जीवन, अहिंसा, सद्भाव और आंतरिक परिवर्तन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दृढ़ करते हैं।

इन पर्वों का समापन क्षमा मांगने और क्षमा प्रदान करने की सुंदर भावना के साथ होता है। यह ऐसी साधना है, जो हृदय को कोमल बनाती है, आत्मा को दृढ़ करती है और समाज को आध्यात्मिक जागृति की साझा यात्रा में जोड़ती है।

आज के उस संसार में, जहां संघर्ष, तनाव और विभाजन बढ़ते दिखाई देते हैं, पर्यूषण और दश लक्षण का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है—

क्षमा, करुणा, संयम और आत्मशुद्धि।

यह ऐसा शाश्वत संदेश है, जो केवल एक पर्व या एक अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य को जीवनभर अपने भीतर झांकने और स्वयं को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।

 

Mail to: Ahimsa Foundation 
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