Jain Diwakar Shri Chouthmal Ji Maharaj Saheb
जैन दिवाकर शà¥à¤°à¥€ चौथमल जी महाराज साहब
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*जगत वलà¥à¤²à¤, पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤§à¥à¤¦ वकà¥à¤¤à¤¾, जैन दिवाकर पूजà¥à¤¯ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ
शà¥à¤°à¥€ चौथमल जी महाराज का जीवन वृतà¥à¤¤à¤µà¤¿. सं.1934 से वि. सं. 2007*
*जनà¥à¤® और बचपन*:
योदà¥à¤§à¤¾à¤“ं, धारà¥à¤®à¤¿à¤• संतों, समाज सà¥à¤§à¤¾à¤°à¤•ों और अनà¥à¤¯ नेताओं के कदमों से à¤à¤¾à¤°à¤¤ की धरती हमेशा पवितà¥à¤° रही है। मालवा का कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° विशेष रूप से बहादà¥à¤° विकà¥à¤°à¤®à¤¾à¤¦à¤¿à¤¤à¥à¤¯, राजा à¤à¥‹à¤œ और अनà¥à¤¯ जैसे शासकों के अलावा कई संतों के à¤à¤¿à¤•à¥à¤·à¥à¤“ं के लिठजाना जाता है। इसी पावन à¤à¥‚मि पर केसरबाई की कà¥à¤•à¥à¤·à¤¿ से वि. सं. 1934 की कारà¥à¤¤à¤¿à¤• शà¥à¤•à¥à¤²à¤¾ तेरस रविवार (ईसà¥à¤µà¥€ सन 18 नवंबर 1877) को मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ के नीमच नगर में à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤° का जनà¥à¤® हà¥à¤†à¥¤ उनके पिता गंगारामजी à¤à¤• धारà¥à¤®à¤¿à¤•, सद-वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° करने वाले परिवार थे। उनके घर बहà¥à¤¤ से साधà¥-संत आते रहते थे और इसलिठपरिवार में धारà¥à¤®à¤¿à¤• संसà¥à¤•ार थे। इस बचà¥à¤šà¥‡ के जनà¥à¤® से पूरा परिवार काफी खà¥à¤¶ था। विदà¥à¤µà¤¾à¤¨ बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£à¥‹à¤‚ और जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿à¤·à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ ने बचà¥à¤šà¥‡ का नाम चौथमल रखा। चौथ शबà¥à¤¦ के चार अरà¥à¤¥ हैं और चार अकà¥à¤·à¤°à¥‹à¤‚ के इस नाम की विशेषताà¤à¤ इस पà¥à¤°à¤•ार हैं-
(1) मोकà¥à¤·-मोकà¥à¤· की लंबी राह में पà¥à¤°à¤¥à¤® तीन जà¥à¤žà¤¾à¤¨ के बाद चौथा à¤à¤¾à¤— शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ और चरितà¥à¤° का अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ तपसà¥à¤¯à¤¾ है और तप पिछले वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ के करà¥à¤®à¥‹à¤‚ के संकटों को मिटा देता है और जीवित à¤à¥€ रहता है।
(2) पाà¤à¤š पà¥à¤°à¤®à¥à¤– वà¥à¤°à¤¤à¥‹à¤‚ में, चौथा बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤šà¤°à¥à¤¯ है और यह आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• साधनाओं में परम आनंद की ओर ले जाने वाला सरà¥à¤µà¥‹à¤šà¥à¤š और सबसे पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ साधन है।
(3) धरà¥à¤® के चार खंडों में, चौथा है à¤à¤¾à¤µ-अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾, पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿, पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿à¥¤ यह मà¥à¤–à¥à¤¯ खंड है जिसके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ मोकà¥à¤· पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया जा सकता है।
(4) 14 गà¥à¤£à¥‹à¤‚ में, चौथा गà¥à¤£ समानता है; अचà¥à¤›à¤¾à¤ˆ (समà¥à¤¯à¤•तà¥à¤µ) मोकà¥à¤· का मारà¥à¤— समà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¥à¤µ के आधार के साथ शà¥à¤°à¥‚ होता है। चौथा बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤šà¤°à¥à¤¯ है और यह आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• साधनाओं में परम आनंद की ओर ले जाने वाला सरà¥à¤µà¥‹à¤šà¥à¤š और सबसे पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ साधन है।
*परिवार* :
चौथमलजी महाराज के दो à¤à¤¾à¤ˆ और दो बहनें थीं। बड़े à¤à¤¾à¤ˆ का नाम कालूराम और छोटे à¤à¤¾à¤ˆ का नाम फतेहचंद था। नवलबाई और सà¥à¤‚दरबाई दो बहनें थीं। सात साल की उमà¥à¤° में चौथमलजी के पिता ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ पढ़ने के लिठà¤à¤• सà¥à¤•ूल में डाल दिया। बचà¥à¤šà¤¾ बहà¥à¤¤ होशियार था और इसलिà¤, वह केवल पढ़ने और लिखने में ही नहीं रà¥à¤•ा बलà¥à¤•ि उसने हिंदी, उरà¥à¤¦à¥‚, अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥€, अंकगणित और अनà¥à¤¯ विषयों का à¤à¥€ अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ किया। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ नई किताबें पढ़ने का शौक था। चूंकि पूरा परिवार ईशà¥à¤µà¤°à¤µà¤¾à¤¦à¥€ था, संगीत में रà¥à¤šà¤¿ रखने वाले चौथमलजी ने à¤à¥€ सà¥à¤µà¤¾à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤• रूप से अनà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨, सचà¥à¤šà¤¾à¤ˆ और बड़ों की सेवा के गà¥à¤£à¥‹à¤‚ को अपनाया।
*दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के साथ अलगाव की ओर à¤à¥à¤•ाव* :
जब चौथमलजी लगà¤à¤— 13 वरà¥à¤· के थे, तब उनके बड़े à¤à¤¾à¤ˆ कालूराम ने जà¥à¤†, शराब पीने आदि के दोष विकसित किà¤à¥¤ à¤à¤• रात, कालूराम लगातार जà¥à¤ में जीत रहा था और इसलिठविपरीत पकà¥à¤· के खिलाड़ियों ने उसे मार डाला। यह घटना वि. सं. 1947–48 की है, से बालक चौथमलजी ने यह सीख ली कि बà¥à¤°à¥€ आदतें हमेशा बà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤¯à¥‹à¤‚ की ओर ही ले जाती हैं। कालूराम की इस असामयिक मृतà¥à¤¯à¥ से चौथमलजी के पिता गंगारामजी को गहरा सदमा लगा और चौथमलजी और उनकी मां केसरबाई की दिन-रात की सेवा के बावजूद उनकी मृतà¥à¤¯à¥ वि. सं.1948 (à¤à¤• मानà¥à¤¯à¤¤à¤¾ वि.सं.1950) में हो गई। इन घटनाओं से मां-बेटा दोनों बहà¥à¤¤ दà¥à¤–ी थे और वे इस दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ की बेकारता को समà¤à¤¨à¥‡ की कोशिश कर रहे थे। माठकेसरबाई बहà¥à¤¤ दà¥à¤–ी थीं लेकिन उन पर चौथमलजी का पालन-पोषण करने, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ किसी काम में लगाने और उनकी शादी कराने की जिमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥€ थी। जब चौथमलजी 16 वरà¥à¤· के थे, तब उनके रिशà¥à¤¤à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ ने उनके विवाह के बारे में सोचा और उनका विवाह वि. सं. 1950 में पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤—ढ़ (राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨) की पूनमचंदजी की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ मानकà¥à¤‚वरबाई से हà¥à¤†à¥¤
*संयम पथ की और* :
चौथमलजी हमेशा धन के साथ-साथ धारà¥à¤®à¤¿à¤• आनंद अरà¥à¤œà¤¿à¤¤ करने की इचà¥à¤›à¤¾ रखते थे। उन दिनों नीमच शहर में बहà¥à¤¤ से साधà¥-संत अकà¥à¤¸à¤° आते रहते थे और चौथमलजी और उनकी माता केसरबाई उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ देखते और सेवा करते थे। à¤à¤• दिन, माठकेसरबाई ने चौथमल जी के सामने दीकà¥à¤·à¤¾ को अपनाने की इचà¥à¤›à¤¾ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ की और कहा, “मैं अपनी आतà¥à¤®à¤¾ की पूरà¥à¤£ à¤à¤²à¤¾à¤ˆ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करना चाहती हूं”और यह सà¥à¤¨à¤•र पà¥à¤¤à¥à¤°, चौथमलजी ने उतà¥à¤¤à¤° दिया, “मैं आपकी इचà¥à¤›à¤¾ की सराहना करता हूं, लेकिन मैं à¤à¥€à¤¦à¥€à¤•à¥à¤·à¤¾ को लेना चाहता हूं”। यह कहकर चौथमल जी ने अपनी माठसे उसकी सहमति देने का अनà¥à¤°à¥‹à¤§ किया, माठने कहा, *मेरे बेटे, तà¥à¤® नवविवाहित हो और तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ कà¥à¤› वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ के लिठअपने परिवार के साथ रहना होगा। आप दीकà¥à¤·à¤¾ तà¤à¥€ ले सकते हैं जब आपकी उचित उमà¥à¤° हो।* चौथमलजी ने उतà¥à¤¤à¤° दिया- *माà¤, यह शरीर सांसारिक सà¥à¤–ों का आनंद लेने के लिठनहीं है। यह तपसà¥à¤¯à¤¾ और संयम के लिठहै। मैं दीकà¥à¤·à¤¾ को अपनाने के लिठदृढ़ संकलà¥à¤ªà¤¿à¤¤ हूं।* दीकà¥à¤·à¤¾ के लिठअपने बेटे की मजबूत à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤“ं को देखकर, मां ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ निरंतर अनà¥à¤®à¤¤à¤¿ दी, लेकिन उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपनी पतà¥à¤¨à¥€ मानकà¥à¤‚वर की à¤à¥€ सहमति लेने के लिठकहा। चौथमलजी ने दीकà¥à¤·à¤¾ के लिठउसकी सहमति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने के लिठअपनी पतà¥à¤¨à¥€ से संपरà¥à¤• किया, लेकिन वह यह कहते हà¥à¤ नहीं मानी कि “न तो मैं दीकà¥à¤·à¤¾ लूंगी, न ही तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ वह रासà¥à¤¤à¤¾ अपनाने दूंगी”। चौथमलजी के ससà¥à¤° à¤à¥€ अपनी बेटी के लिठबहà¥à¤¤ चिंतित थे और उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने चौथमलजी को दीकà¥à¤·à¤¾ को न अपनाने के लिठकहा। इसके अलावा, कई अनà¥à¤¯ रिशà¥à¤¤à¥‡à¤¦à¤¾à¤° à¤à¥€ थे। , बड़ों और दोसà¥à¤¤à¥‹à¤‚ ने चौथमलजी को दीकà¥à¤·à¤¾ न अपनाने के लिठमनाने की कोशिश की, लेकिन कोई à¤à¥€ सफल नहीं हो सका। उन सà¤à¥€ का जवाब देते हà¥à¤ “चौथमलजी ने सरल तरीके से दीकà¥à¤·à¤¾ गà¥à¤°à¤¹à¤£ करना सà¥à¤µà¥€à¤•ार कर लिया और इसलिठवे वि. सं. 1952 की फालà¥à¤—à¥à¤¨ शà¥à¤•à¥à¤²à¤¾ तृतिया (ईसà¥à¤µà¥€ सन 16 फरवरी 1896) रविवार को बोलिया गà¥à¤°à¤¾à¤® में कविवर हीरालालजी महाराज के शिषà¥à¤¯ बन गà¤à¥¤ चौथमलजी के दीकà¥à¤·à¤¾ के दो महीने बाद, उनकी माता जी केसरबाई ने à¤à¥€ महासती शà¥à¤°à¥€ फà¥à¤¨à¥à¤¦à¤¾à¤œà¥€ की निशà¥à¤°à¤¾ में दीकà¥à¤·à¤¾ को अपनाया। इस पà¥à¤°à¤•ार, बहादà¥à¤° पà¥à¤¤à¥à¤° और बहादà¥à¤° माठने अपनी आतà¥à¤®à¤¾ की मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ की तलाश शà¥à¤°à¥‚ कर दी।
*मोकà¥à¤· की तलाश में यातà¥à¤°à¤¾* :
चौथमलजी महाराज, जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने दीकà¥à¤·à¤¾ को गोद लिया था, ने अपना पहला मानसून नीमच छावनी में पारित किया। इन दिनों उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने यहाठदशवैकालिक और औपपतिक के सूतà¥à¤°à¥‹à¤‚ का अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ किया। वह à¤à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ से दूसरे सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर जाते हà¥à¤ और à¤à¥€ कई शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ करते रहे।
*गà¥à¤°à¥ आजà¥à¤žà¤¾ का पालन*:
जब चौथमलजी à¤à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ से दूसरे सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर जा रहे थे, उनके गà¥à¤°à¥ ने आपको पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤—ढ़ में सांसारिक जीवन की अपनी पतà¥à¤¨à¥€ शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¤à¥€ मानकà¥à¤‚वरबाई को उपदेश देने के लिठकहा। चौथमलजी को सांसारिक सà¥à¤–ों से कोई लगाव नहीं था, लेकिन उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपने ससà¥à¤° और अनà¥à¤¯ लोगों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पारिवारिक à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ के कारण पारिवारिक जीवन में वापस खींचे जाने का डर था। फिर à¤à¥€, उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने शिकà¥à¤·à¤• के निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥‹à¤‚ का पालन किया और पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤—ढ़ चले गà¤à¥¤ उनका उपदेश वà¥à¤¯à¤¾à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¨ बाजार में तय किया गया था। उनकी सांसारिक पतà¥à¤¨à¥€à¤®à¤¾à¤¨à¤•à¥à¤‚वरबाई और ससà¥à¤° जी को चौथमलजी के आगमन के बारे में पता चला। हालाà¤à¤•ि, ससà¥à¤° जी उनका उपदेश सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ नहीं आठथे लेकिन मानकà¥à¤‚वरबाई आ चà¥à¤•ी थीं। उसने चौथमलजी को पारिवारिक जीवन में वापस लाने की कोशिश की और अपने आगे के पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸à¥‹à¤‚ में वह मंदसौर, जावरा और अनà¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ पर गई। उसने कम से कम à¤à¤• बार चौथमलजी को मिलने के लिठजोर दिया और आशà¥à¤µà¤¾à¤¸à¤¨ दिया कि वह वही करेगी जो उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ बाद में पसंद आà¤à¤—ा। उसकी इचà¥à¤›à¤¾ मान ली गई और चौथमलजी ने उसे चार-छह साधà¥à¤µà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ और कà¥à¤› संतों की उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में बà¥à¤²à¤¾à¤¯à¤¾à¥¤ उसने आकर पूछा, “तà¥à¤®à¤¨à¥‡ दीकà¥à¤·à¤¾ का बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤šà¤°à¥à¤¯ और संयमित जीवन अपनाया है, अब मैं कà¥à¤¯à¤¾ करूठ? मैं अपना जीवन कैसे वà¥à¤¯à¤¤à¥€à¤¤ करूठ? किसकी शरण में जाऊठ?” चौथमलजी ने गंà¤à¥€à¤° सà¥à¤µà¤° में उतà¥à¤¤à¤° दिया, “आपके और मेरे बीच कई जनà¥à¤®à¥‹à¤‚ में सांसारिक संबंध थे लेकिन हमारे बीच कोई धारà¥à¤®à¤¿à¤• -संबंध नहीं था। धरà¥à¤® ही जीने का सचà¥à¤šà¤¾ सहारा है। यदि आप मेरी बात को सà¥à¤µà¥€à¤•ार करना चाहते हैं, तो आप धरà¥à¤® का आशà¥à¤°à¤¯ लेवे और दीकà¥à¤·à¤¾ को अपनाने वाली बनें। यह आपके लिठसबसे अचà¥à¤›à¤¾ तरीका है”। सचà¥à¤šà¥‡ संतों के वचन हमेशा बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ होते हैं। मानकà¥à¤‚वरबाई को दीकà¥à¤·à¤¾ के लिठअनà¥à¤°à¥‹à¤§ किया और वह वि. सं. 1967 में दीकà¥à¤·à¤¾ लेकर साधà¥à¤µà¥€ बन गई। इस दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। उसने छह वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ तक विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ तपसà¥à¤¯à¤¾ की और यह देखकर कि उसका अंत बहà¥à¤¤ निकट है, उसने संथारा अपनाया। वि. सं. 1973 में शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤£ मास की शà¥à¤•à¥à¤² पकà¥à¤· की दशमी को उनका देहांत हो गया।
जैन दिवाकर चौथमलजी महाराज जैन धरà¥à¤® के अनà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¥€ थे और फिर à¤à¥€ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अनà¥à¤¯ सà¤à¥€ संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ और धरà¥à¤®à¥‹à¤‚ का समà¥à¤®à¤¾à¤¨ किया। वह पà¥à¤°à¥‡à¤® और सहानà¥à¤à¥‚ति से मितà¥à¤°à¤¤à¤¾ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ करना चाहता थे। वह दरà¥à¤¦ सहकर à¤à¥€ दूसरों को खà¥à¤¶ करना चाहता थे। वह धरà¥à¤® और जीवन के सार को बहà¥à¤¤ सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ रूप से समà¤à¤¤à¥‡ थे। वे जातिगत à¤à¥‡à¤¦à¤à¤¾à¤µ, कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¤µà¤¾à¤¦ और संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯-à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤“ं से ऊपर थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने दूसरों को धारà¥à¤®à¤¿à¤• और महान बनने के लिठपà¥à¤°à¥‹à¤¤à¥à¤¸à¤¾à¤¹à¤¿à¤¤ किया। उनमें दूसरों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ साहस और सहानà¥à¤à¥‚ति थी। वह सबके पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अपने पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤ªà¥‚रà¥à¤£ वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° से बहà¥à¤¤à¥‹à¤‚ को आकरà¥à¤·à¤¿à¤¤ कर सकते थे। उनकावà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¶à¤¾à¤²à¥€ था। उनकी गतिविधियां अनà¥à¤•रणीय थीं।
*अहिंसा और आतà¥à¤®-संयम* :
उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ के लिठहिंदू और मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨ समान रूप से आते थे। उसके उपदेशों को सà¥à¤¨à¤•र उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपनी बà¥à¤°à¥€ आदतों को छोड़ दिया। अहिंसा के विसà¥à¤¤à¤¾à¤° और जीवन के विकास में उनका योगदान उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय था। à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के कई शासकों, अधिकारियों, विदà¥à¤µà¤¾à¤¨ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚, करोड़पति, साहूकारों और रंक अनà¥à¤¯ लोगों को आकरà¥à¤·à¤¿à¤¤ किया। जैन धरà¥à¤® में अहिंसा का सबसे महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ विचार है और लगà¤à¤— सà¤à¥€ धारà¥à¤®à¤¿à¤• संतों ने अहिंसा, दया, सहानà¥à¤à¥‚ति और मितà¥à¤°à¤¤à¤¾ पर जोर दिया है। जब à¤à¥€ कोई जैन दिवाकर शà¥à¤°à¥€ चौथमलजी महाराज को सà¥à¤¥à¤¾à¤¨-सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर à¤à¥à¤°à¤®à¤£ के दौरान कà¥à¤› उपहार देना चाहता था, तो वे उनसे कहते थे, *तà¥à¤¯à¤¾à¤— करो, दया करो और उचित वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° करो*। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने महाराषà¥à¤Ÿà¥à¤°, मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶, राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨, हरियाणा, पंजाब और कई अनà¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ का विचरण किया।और अहिंसा और जैन धरà¥à¤® के सिदà¥à¤§à¤¾à¤‚तों का पà¥à¤°à¤šà¤¾à¤° किया। उनका à¤à¤¾à¤·à¤£ शà¥à¤°à¥‹à¤¤à¤¾à¤“ं को बहà¥à¤¤ गहराई से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ करता था। शà¥à¤°à¥€ जैन दिवाकर चौथमलजी के उपदेशों को सà¥à¤¨à¤•र अनेक लोगों ने अपने जीवन का मारà¥à¤— बदल दिया। वे अपने कà¥à¤•रà¥à¤®à¥‹à¤‚ के लिठपशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¤¾à¤ª करने लगे। शिकारियों ने अपने शिकार बाणों और धनà¥à¤·à¥‹à¤‚ को फेंक दिया। यà¥à¤µà¤• बà¥à¤°à¥€ आदतों से मà¥à¤•à¥à¤¤ होकर समाज की सेवा करने लगे। नासà¥à¤¤à¤¿à¤• सरà¥à¤µà¤¶à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤®à¤¾à¤¨ के बारे में सोचने लगे।
*à¤à¤• सचà¥à¤šà¤¾ संत* :
उनका à¤à¤¾à¤·à¤£ सरल लेकिन à¤à¥‡à¤¦à¥€ था। वह साधारण विषयों पर बोलना पसंद करते थे। दरà¥à¤¶à¤• सार को बहà¥à¤¤ आसानी से समठसकते थे।उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने वैदिक शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚, छंदों, वाकà¥à¤¯à¤¾à¤‚शों, दृषà¥à¤Ÿà¤¾à¤‚तों और कविताओं के माधà¥à¤¯à¤® से बात की। उनका à¤à¤¾à¤·à¤£ संगीतमय होता था और हर कोई उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सà¥à¤¨à¤¨à¤¾ पसंद करता था। लोगों ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ घंटों à¤à¤• टक सà¥à¤¨à¤¨à¤¾ पसंद करते थे। हिंदू, मà¥à¤¸à¥à¤²à¤¿à¤®, पारसी, ईसाई और जीवन के सà¤à¥€ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के लोग, अमीर और गरीब, बूढ़े और जवान, पà¥à¤°à¥à¤· और महिलाà¤à¤‚, उचà¥à¤š परिवार के साथ-साथ निमà¥à¤¨ परिवार के लोग उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ के लिठदौड़ पड़े।
*à¤à¤• सà¥à¤§à¤¾à¤°à¤µà¤¾à¤¦à¥€* :
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने समाज में सà¥à¤§à¤¾à¤° के लिठआशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯à¤œà¤¨à¤• कारà¥à¤¯ किठहैं। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने बाल-विवाह और उनà¥à¤¨à¤¤ आयà¥-विवाह, दहेज, मृतà¥à¤¯à¥à¤à¥‹à¤œ, देवताओं के लिठजानवरों की बलि और असà¥à¤ªà¥ƒà¤¶à¥à¤¯à¤¤à¤¾ जैसी कà¥à¤°à¥€à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को रोकने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जेल से रिहा होने के बाद कैदियों को सजà¥à¤œà¤¨ बनने की सलाह दी, उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जानवरों पर कà¥à¤°à¥‚रता के खिलाफ बात की। उनके उपदेशों ने समाज में वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ सà¤à¥€ पà¥à¤°à¤•ार की बà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤¯à¥‹à¤‚ को दूर करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया।
*साहितà¥à¤¯à¤•ार* :
वे उचà¥à¤šà¤•ोटि के धारà¥à¤®à¤¿à¤• साहितà¥à¤¯ के बहà¥à¤¤ अचà¥à¤›à¥‡ लेखक थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने कावà¥à¤¯ और गदà¥à¤¯ दोनों की रचना की।इन कविताओं को पढ़कर पाठक बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ हà¥à¤à¥¤ जिस तरह à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€à¤•ृषà¥à¤£ ने अपनी गीता में सà¤à¥€ वेदों और अनà¥à¤¯ शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का सार दिया है, उसी तरह शà¥à¤°à¥€ दिवाकर चौथमलजी महाराज ने अपनी पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• निरà¥à¤—à¥à¤°à¤‚थ पà¥à¤°à¤µà¤šà¤¨ में लगà¤à¤— सà¤à¥€ जैन शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में खोज कर à¤à¤—वान महावीर के उपदेशों का पालन किया है। यह चौथमलजी महाराज दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ जैन समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ को दी गई à¤à¤• अमर कृति है। यह आने वाली सदियों के लिठसà¤à¥€ जैनियों को पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤¿à¤¤ करेगा। इसके अलावा दिवाकर दिवà¥à¤¯ जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿ नामक पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• में उनके सà¥à¤µà¤¯à¤‚ के वà¥à¤¯à¤¾à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ का संगà¥à¤°à¤¹ और पà¥à¤°à¤•ाशन किया जाता है, जो 20 à¤à¤¾à¤—ों में है।
*à¤à¤•ता के लिठà¤à¤• कदम आगे*:
दीकà¥à¤·à¤¾ को अपनाने के बाद à¤à¥€, चौथमलजी महाराज ने जैन धरà¥à¤® में कई संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ को à¤à¤•जà¥à¤Ÿ करने की पूरी कोशिश की और इस लकà¥à¤·à¥à¤¯ को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने के लिà¤, उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤• मंच से दिगंबर आचारà¥à¤¯ सà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤—रजी महाराज और शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤‚बर मूरà¥à¤¤à¤¿ पà¥à¤œà¤• आचारà¥à¤¯ आनंदसागरजी महाराज के साथ कोटा वरà¥à¤·à¤¾à¤µà¤¾à¤¸ के दौरान पà¥à¤°à¤µà¤šà¤¨ का फैसला किया। कोटा में जैन धरà¥à¤® के कई संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ के बीच à¤à¤•ता सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ करने की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से। पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ मà¥à¤–à¥à¤¯ रूप से सफल रहा। जब वे सादड़ी में वरà¥à¤·à¤¾à¤µà¤¾à¤¸ बिता रहे थे, उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जैन पà¥à¤°à¤•ाश के संपादक शà¥à¤°à¥€ à¤à¤µà¥‡à¤°à¤šà¤‚दà¤à¤¾à¤ˆ जाधवजी कामदार के सामने विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ जैन संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ के बीच à¤à¤•ता लाने के लिठअपने विचार वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ किठथे। उनके सà¥à¤à¤¾à¤µ संकà¥à¤·à¥‡à¤ª में इस पà¥à¤°à¤•ार थे:-
(i) सà¤à¥€ संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ के साध–साधà¥à¤µà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को à¤à¤• ही सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर संयà¥à¤•à¥à¤¤ समà¥à¤®à¥‡à¤²à¤¨ करना चादहà¤à¥¤
(ii) धारà¥à¤®à¤¿à¤• संसà¥à¤•ार करने के लिठकेवल à¤à¤• ही वà¥à¤¯à¤¿à¤¸à¥à¤¥à¤¾ होनी चादहठऔर सà¤à¥€ संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ के साधॠसंतों और सतियों को इसका पालन करना चादहà¤à¥¤
(iii) सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¤•वासी जैन संघों को उचà¥à¤š सà¥à¤¤à¤° का पà¥à¤°à¤¾à¤®à¤¾à¤£à¤£à¤• सादहतà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤•ारà¥à¤¶à¤¤ करना चादहà¤à¥¤
(iv) किसी को à¤à¥€ दूसरे संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯ के सदसà¥à¤¯ की टिपà¥à¤ªà¤£à¥€ या आलोचना नहीं करनी चाहिà¤à¥¤
(v) उतà¥à¤¸à¤µ के दिन और उतà¥à¤¸à¤µ के अनà¥à¤¯ दिन सरà¥à¤µà¤¸à¤®à¥à¤®à¤¤à¤¿ से तय किठजातेहैं।
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤—वान महावीर के जनà¥à¤®à¤¦à¤¿à¤¨ को संयà¥à¤•à¥à¤¤ रूप से मनाने की सलाह दी ताकि कई संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ की à¤à¤•ता अचà¥à¤›à¥€ तरह से सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ हो सके। उजà¥à¤œà¥ˆà¤¨, अजमेर, आगरा आदि सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ के दिगंबर, शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤‚बर, सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¤•वासी और अनà¥à¤¯ संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ के सà¤à¥€ जैनियों ने à¤à¤• साथ मिलकर à¤à¤—वान महावीर का जनà¥à¤®à¤¦à¤¿à¤¨ सà¤à¥€ खà¥à¤¶à¥€ और खà¥à¤¶à¥€ के साथ मनाया। शà¥à¤°à¥€ जैन दिवाकर चौथमलजी महाराज के पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸à¥‹à¤‚ से ही यह संà¤à¤µ हो सका। यह पà¥à¤°à¤¥à¤¾ आज à¤à¥€ कई सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ पर जारी है। कोटा में जैन समाज की à¤à¤•ता की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से यह काल अदà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ रहा। इस समय उनके पेट में दरà¥à¤¦ हà¥à¤† और यह 14 दिनों तक जारी रहा।
*महापà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤£*:
वि. सं. 2007 मृगसिर शà¥à¤•à¥à¤²à¤¾ नवमी (ईसà¥à¤µà¥€ सनॠ17 दिसंबर 1950) रविवार को पà¥à¤°à¤¾à¤¤à¤ƒ 8.00 बजे राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ की औदà¥à¤¯à¥‹à¤—िक नगरी कोटा में आपका संथारा सहित सà¥à¤µà¤°à¥à¤—वास हो गया। आपकी आतà¥à¤®à¤¾ निरपेकà¥à¤· के साथ à¤à¤• हो गई। जैन दिवाकर शà¥à¤°à¥€ चौथमलजी महाराज à¤à¤• बहà¥à¤†à¤¯à¤¾à¤®à¥€ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ थे। वे à¤à¤• पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ वकà¥à¤¤à¤¾, सà¥à¤§à¤¾à¤°à¤•, कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी, à¤à¤•ता में विशà¥à¤µà¤¾à¤¸ रखने वाले और यà¥à¤— के महान वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ थे। वह हमें आने वाले यà¥à¤—ों के लिठआकाश में सूरà¥à¤¯ के रूप में पà¥à¤°à¤¬à¥à¤¦à¥à¤§ करता रहेगा। उनके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ किठगठकारà¥à¤¯ पूरे जैन समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ को पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ देते रहे हैं, और यà¥à¤—ों-यà¥à¤—ों तक देते रहेंगे। आज उनके 145 वे जनà¥à¤® जयंती दिवस पर उनà¥à¤¹à¥‡ सादर वंदन, नमन, अà¤à¤¿à¤¨à¤‚दन। आपकी कृपा और आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦ संघ, समाज, और परिवार पर हमेशा बरसती रहे।
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लेखक :- सà¥à¤°à¥‡à¤¨à¥à¤¦à¥à¤° मारू, इंदौर ( +91 98260 26001)
नोट : www.jainsamaj.org में शà¥à¤°à¥€ पी. के. शाह जी के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ दी गई जानकारी को सà¥à¤µà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¿à¤¤ कर पà¥à¤°à¥‡à¤·à¤¿à¤¤ कर रहा हूं।
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Mail to : Ahimsa Foundation
www.jainsamaj.org
R071122
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