इथोपिया और केन्या की यात्रा
श्री निर्मल कुमार जैन ( सेठी )
राष्ट्रीय अध्यक्ष-श्री भा. दि. जैन महासभा

दिल्ली में 14 मई, 2017 रविवार को गोम्टेश्वर बाहुबलि भगवान का महामस्तकाभिषेक जो 17 फरवरी से 25 फरवरी 2018 तक सम्पन्न होने जा रहा है। उसकी विशाल मीटिंग दिल्ली में शाह आॅडिटोरियम में हुई उसमें सम्मिलित होकर झांसी रात्रि में ट्रेन द्वारा 15 मई, 2017 को सुबह पहुंचा।

आचार्यश्री विरागसागर जी महाराज के संघ का युग प्रतिक्रमण यति सम्मेलन महामहोत्सव में सम्मिलित हुआ और साधुओं के दर्शन किये। महासभा का नैमित्तिक अधिवेशन सम्पन्न करा कर आचार्यश्री विरागसागर जी महाराज का आशीर्वाद लेकर 16 तारीख को रात्रि दो बजे इथोपिया के लिए रवाना हुआ और आदिस अबाबा होते हुए मैकाले प्रातः 9 बजे पहुंचा। वहां पर भारत, यूके एवं केन्या से गये हुए विद्वान और श्रेष्ठी मिले।

17 मई को होने वाले सेमीनार की सब चर्चा हुई और जानकारी मिली कि इथोपिया में स्थित भारत में राजदूत श्री अनुराग श्रीवास्तव साहब समापन समारोह को सम्बोधित करने 18 तारीख को पधारेंगे, सुनकर खुशी हुई। उसके बाद 16 मई को ही मैं, श्री विकास जैन, श्री गौरव जैन सी. ए. (गाजियाबाद) और श्री विनीत जैन सी. ए. (नई दिल्ली) एक गाड़ी से अल्माका पहुंचे जो मेकाले से 42 किलोमीटर दूर था। अल्माका मन्दिर में प्राचीन वेदी मिली। तीर्थंकर की मूर्ति की जगह थी, पर खाली। मूर्ति की दिशा ठीक पूर्व की थी। मूर्ति के अभिषेक के बाद पानी निकलने की नाली थी। उसमें लगभग दो फुट का गहरा स्थान था जहां अभिषेक का जल इकट्ठा होता था। अभिषेक के जल को वहां से बाहर ले जाने के लिए लगभग 10 फुट लम्बी नाली थी। वेदी के चारों तरफ प्राचीन लिपि खुदी हुई थी जिसे हम लोग पढ़ नहीं सके। जर्मन के लोग इसके जीर्णोंद्धार का कार्य कर रहे हैं। अनेक सामग्री उनके स्टोर में रखी हुई है परन्तु स्टोर बन्द होने के कारण हम नहीं देख सके। यहां गांव में एक म्युज़ियम भी था, पर वह बन्द मिला। यहां पर अन्य स्थानों को देखती हुई हमारी टीम भी आ गई।

यहां पर हमने डॉ. राजमल जी जैन (अहमदाबाद), डॉ. भागचन्द जैन भास्कर (नागपुर), श्री विजय कुमार जी (सागर), डॉ. जयन्तीलाल जी जैन (मंगलायतन विश्वविद्यालय), श्री आर.सी. जैन (सहारनपुर), डॉ. बाबूलाल सेठी (जयपुर), डॉ. वर्षा रानी (गुडगांव), डॉ. कुसुम गोपाल (लन्दन, यूके), श्री ए. के. खन्ना (नई दिल्ली), श्री चिंरजीव चैधरी (इथोपिया) ने हमें जानकारी दी कि उन्होंने येहा (Yeha) में मून टैम्पल (Moon Temple) देखा, जिसकी विशाल दिवारें आज भी मौजूद हैं। यहां पर लगभग 50-55 फीट ऊंची चन्द्रप्रभु भगवान की मूर्ति रही होगी। तीन जगह उन्होंने चन्द्र आकार का चिह्न बिन्दु सहित देखा। वहां भी प्राचीन लिपी में लिखे हुए लेख देखे। मन्दिर के सामने राजा का महल भी देखा। राजा निश्चित रूप से जैन रहा होगा। इस मून मन्दिर को चर्च में बदला गया था। कुछ समय के बाद उसको खाली कर दिया गया क्योंकि 1978 में यूनेस्को द्वारा इस मन्दिर को ‘वल्र्ड हैरिटेज साईट’ घोषित किया गया। इस मन्दिर के नीचे जर्मन लोगों ने वर्ष 2009 से खुदाई शुरू की है और उसमें क्या-क्या सामग्री प्राप्त हुई है, वह अलग जगहों पर रखी हुई है। परन्तु खुदाई से प्राप्त सामग्री को देख नहीं सके हैं। येहा (Yeha) के इस मन्दिर मून टैम्पल को देखकर सब अत्यन्त प्रसन्न हुए।

उन्होंने बताया कि येहा (Yeha) से यह लोग एक्जाम   (Axum) गये। जहां पर प्राचीनकाल की गुफायें देखीं। जिनपर सम्भवतः निग्र्रन्थ मुनि के लेटने की जगह भी थी। यह गुफा ‘यू’ के आकार में थी। यहां पर चार कोनों में चार स्थान थे। उन गुफाओं में भारत की उदयगिरि खण्डगिरि व दक्षिण की अनेक गुफाओं की तरह त्यागियों के सोने की जगह देखी। उनके अनुसार यहां जैन मुनि रहते थे और तपस्या करते थे। इसके बाद वे लोग अल्माका पहुंचे और वहां पर हम लोगों ने साथ में साईट को देखा। हम सब लोग शाम को मेकाले आ गये।

17 मई को मेकाले विश्वविद्यालय के विशाल हॉल में प्रातः 9 बजे सेमीनार प्रारम्भ हुआ। हॉल में भगवान महावीर का चित्र भी लगाया गया।

प्रोफेसर बिलियम मोकोनेन (अध्यक्ष दर्शन विभाग, मेकाले यूनीवर्सिटी) ने सेमीनार की रूपरेखा बताई और कहा कि अफ्रीका की संस्कृति एवं जैन संस्कृति मिलकर विश्व में शांति स्थापित कर सकती है। उन्होंने इस कार्य में डॉ. राजमल जैन, डॉ. भागचन्द भास्कर एवं श्री ए. के. खन्ना के योगदान की प्रशंसा की और बताया कि इस सेमीनार के द्वारा हमें एक-दूसरे की संस्कृति की जानकारी प्राप्त होगी और इससे विश्व में शान्ति स्थापित होने की सम्भावना बढ़ेगी।

वहां के विश्वविद्यालय के अध्यक्ष ने अपने उद्घाटन भाषण में सेमीनार की प्रशंसा की। उन्होंने जैन धर्म के अहिंसा सिद्धान्त की भी प्रशंसा की और अफ्रीका की संस्कृति की भी व्याख्या की। भारत से आये विद्वानों को धन्यवाद दिया।

मैंने डॉ. गोकुलचन्द जी जैन द्वारा लिखी पुस्तक ‘विदेशों में जैन धर्म’ में अबीसीनिया और इथोपिया मे बारे में जो लिखा है, वह बताया। हमने बताया कि हजारों वर्ष पहले यहां जैन मुनि विचरण करते थे और अहिंसा का प्रचार करते थे। हम उसी इतिहास के प्रमाण ढूंढ़ने आपके पास आये हैं। आप लोगों से हम सहयोग की अपेक्षा करते हैं और आपको आश्वासन देते हैं कि आपके इस प्रयास में All India Digamber Jain Heritage Preservation Organisation का पूरा सहयोग आपको मिलता रहेगा। हमने उन्हें यह भी बताया कि अगले कुछ वर्षों भारत से बाहर लगभग 40 देशों के विश्वविद्यालयों में जाकर सेमीनार करेंगे। हमने इस तरह का पहला सेमीनार फरवरी 2017 में कैलानिया यूनीवर्सिटी (कोलम्बो, श्रीलंका) आयोजित किया था, जिसमें यह बात प्रमाणित हुई कि बौद्ध ध्णर्म स्थापित होने से पूर्व वहां जैन धर्म था और अनुराधापुरम जैन राजा की राजधानी थी। इसी तरह से अफ्रीका में प्राचीनकाल में जैन धर्म था। उसकी खोज में हम निकले हैं और हमें काफी सामग्री प्राप्त हुई हैं। उपस्थित सभा को बताया कि इस देश में उपवास करने को महत्व देते हैं जोकि जैन धर्म में भी महत्व दिया जाता है। उपवास के दिनों में केवल एक बार शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करने की प्रथा है। इसी तरह के नियम जैन धर्म में भी है।

इसके बाद सेमीनार प्रारम्भ हुआ।
17 मई को 2 अलग-अलग सत्रों में विद्वानों के भाषण हुए, जिनके विषय निम्नलिखित है। प्रथम सत्र डॉ. कुसुम गोपाल (यू एन टैक्नीकल एक्स्पर्ट) की मध्यस्थता (Moderator) में सम्पन्न हुआ।

1 Prof. Bhagchand Jain (AIDJHPO, Historicity of meditation and Salivation in Jain Tradition)
2 Prof. Jayanti Lal Jain (AIDJHPO, Meditation to Salivation-Jain Perspective)
3 Gaurav Jain (AIDJHPO), International Conference Proposal On African and Jain 

Philosophies: Indigenous Enlightement in Peace Building

दूसरा सत्र डॉ. जोहानस असवी (Dr. Yohannes Assfew) की मध्यस्थता (Moderator) में सम्पन्न हुआ।

1 Mr. Fasil Merawi (Addis Ababa University Zara Yacob's Hatata and the vitality of an 
Indigenous Ethiopian Philosophy) 
2 Dr. Chiranjib Kumar (AIDJHPO, Ethiopian Orthodox Christianity and Indian Jain Philosophy 
A Common Interlinkage For Saving Cultural Heritage And Indigenous Knowledge In Peace 
Buildig)
3 Mr. Dessalegn Seyoum (Addia Ababa 'Locaglaziation'; Promoting African Philosophy while 
Countering Westernization, 
4 Mr. Amon Bekele (Mekelle University Ethno-Philosophy as an Instrument of Oppression)

18 मई को 2 अलग-अलग सत्रों में विद्वानों के भाषण हुए, जिनके विषय निम्नलिखित है। प्रथम सत्र डॉ. टिसडे एलेमू (Dr. Tseday Alemu) की मध्यस्थता (Moderator) में सम्पन्न हुआ।

1 Mr. Belete Molla (Addis Ababa University Beyond Cartesian Philosophy of Essentialism 
and the Quest for Intercultural Discourse: Some Examples) 
2 Dr. Kusum Gopal (UN Technical Expert Ahimsa as Intangible heritage, Ubuntu as its 
instrument: Inclusive cosmologics for Peace building) 
3 Mr. Mulata Hiluf (Mekelle University Accounts of Personhood in African Traditional Thought 
(ATI) and Peace Building Projects in African Community), 
4 Journalist Varsha Rami (AIDJHPO Walking an Indigenous Path to World. The Shared 
Visions of the Traditional African and Jain Philosophies)

दूसरा सत्र डॉ. मुमाह सोलोमन जे (Dr. Mumah Solomon) की मध्यस्थता (Moderator) में सम्पन्न हुआ।

1 Dr. S. K. Dwivedi (AIDJHPO Analyzing Philosophy and Physiognomy of Jain Art), 
2 Prof. B. L. Sethi (Jainism Versus peace-building)

सेमीनार की सफलता को देखते हुए मेकाले विश्वविद्यालय की ओर से एक MOU प्रस्तावित किया गया जिसमें उन्होंने मेकाले विश्वविद्यालय और ऑल इंडिया दिगम्बर जैन हैरिटेज प्रीजर्वेशन आर्गेनाईजेशन मिलकर भविष्य में मिलकर कार्य करना तय किया। उसका प्रारूप दिखाया गया और उसको हम लोगों ने भी मान्यता प्रदान कर दी। इस तरह से मेकाले विश्वविद्यालय और महासभा हमेशा एक-दूसरे को सहयोग देंगे और सहयोग लेंगे की बात पक्की हो गई।

समापन समारोह का संचालन प्रोफेसर बिनयाम माकोनेन (Prof. Binyam Makonen) ने किया।

समापन समारोह में श्रीमान केन्डीया जी. हेवॉट (Dr. Kindeya G. Hiwot) अध्यक्ष मेकाले विश्वविद्यालय (इथोपिया) ने इस समारोह को सफल बताया। और उन्होंने कहा कि भविष्य में भी इस तरह के सेमीनार किये जायेंगे। उन्होंने बताया कि इस सेमीनार में ‘अहिंसा परमो धर्मः के बारे में अफ्रीका के लोगों को जानकारी मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि यहां की जो प्राचीन संस्कृति है, उसकी खोज करने में भी मेकाले विश्वविद्यालय अपना पूरा सहयोग देगा। उन्होंने भारत के राजदूत श्री अनुराग श्रीवास्तव का भावभीना स्वागत किया।

उसके बाद मेरा भाषण हुआ जिसमें मैंने मेकाले विश्वविद्यालय के इस आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। साथ ही भारत के राजदूत को पधारने पर उनका बहुत-बहुत अभिनन्दन किया। हमने उन्हें बताया कि आपके पधारने से हम गौरवान्वित हुए हैं। मेकाले यूनीवर्सिटी आने से पहले हम श्री वी.के. सिंह विदेश राज्य मंत्री भारत सरकार के मिले थे और उन्होंने इस सेमीनार के बारे में बताया। माननीय राज्य मंत्री बहुत खुश हुए और उन्होंने इस सेमीनार की सफलता के लिए हमें अपना आशीर्वाद दिया है। हमने श्री अनुराग श्रीवास्तव जी से निवेदन किया कि इथोपिया की संस्कृति का भारत के जैन धर्म से सम्पर्क रहा है और यहां पर जैन पुरातत्व की बहुत चीजें मिल रही हैं। इस खोज के कार्य में हमने श्रीवास्तव जी से अनुरोध किया कि वे अपने दूतावास का सहयोग हमें समय-समय पर देते रहें तो प्राचीन चीजों की खोज हो सकेगी जो विश्व के इतिहास को प्रभावित करेगी।

भारतीय राजदूत श्री अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि All India Digamber Jain Heritage Preservation Organisation को धन्यवाद देता हूं और भारत से आये हुए सभी विद्वानों को धन्यवाद दिया जो इतना परिश्रम करके इतनी दूर आकर जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धान्तों के बारे में लोगों को बताया। साथ ही उन्होंने मेकाले विश्वविद्यालय के सहयोग से ऐसा ऐतिहासिक सेमीनार सम्पन्न कराया। इस तरह के शैक्षणिक और अनुसंधान के कार्यों में भारतीय दूतावास का पूरा सहयोग देने की घोषणा की। उन्होंने मेकाले विश्वविद्यालय के अध्यक्ष, प्रोफेसर, विद्वानों और छात्रों को भी धन्यवाद दिया। उन्होंने श्री निर्मल कुमार जैन सेठी की भी प्रशंसा की और उन्हें आश्वासन दिया कि वे All India Digamber Jain Heritage Preservation Organisation के खोज के कार्य हैं, उन्हें भारतीय दूतावास अपना सहयोग देता रहेगा।

19 मई को हम लोग प्रातःकाल 10ः30 बजे आदिस अबाबा पहुंचे। होटल में कुछ देर विश्राम के बाद हम लोग वहां के नेशनल म्युज़ियम को देखने गये। नेशनल म्युज़ियम में लूसी (Lucy) जो विश्व का प्राचीनतम मनुष्य कंकाल है, देखने का अवसर मिला जिसको तीस लाख बीस हजार साल पुराना बताते हैं। इस कंकाल की खोज 1974 में हुई थी और इससे मानव सभ्यता के बारे में पता चलता है। इस बीच ‘अथॉरिटी फॉर रिसर्च एण्ड कंजर्वेशन ऑफ कल्चरल हेरिटेज’ के निदेशक पुरातत्व नेशनल म्युज़ियम ने कुछ ऑफिसरो के संदर्भों देकर वहां के रिजर्व कलैक्शन को देखा। इस तरह से रिजर्व कलैक्शन की बहुत सी चीजें हैं जो हमारी भारतीय संस्कृति से मिलती है। इसमें स्वास्तिक का चिह्न, कुछ लाल एवं काले बर्तन, सिलबट्टे, चक्की आदि का वहां प्रचूर मात्रा में संग्रह था। यह संग्रह बहुत बड़ा है, जिसमें उनके पास 50 हजार के करीब अवशेष हैं। जो इथोपिया में अलग-अलग जगहों से मिले हैं। यह भी एक बहुत अच्छा प्रमाण है जो यह बता रहा है कि यहां पर भारतीय सभ्यता का प्रभाव के अवशेष हैं, जिसको हम पन्द्रहवीं शताब्दी ईसा पूर्व से आगे ले जाकर चैथी शताब्दी ईसवी के अवशेष एक्जाम (Axum) म्युज़ियम में दर्शाये गये हैं। यह इस बात का प्रमाण हैं कि चैथी शताब्दी में इथोपिया में इसाई धर्म की स्थापना हुई और एक्जाम (Axum) सभ्यता का प्रारम्भ हुआ। इन प्रमाणों से पता चलता है कि चैथी शताब्दी से पूर्व इथोपिया में जैन धर्म जैसे रिती-रिवाजों का चलन था और जो इसाई धर्म (Orthodox) में बदल गया और आज ऑर्थोडॉक्स इसाई धर्म के लोग अपनी पुरानी विरासत (सभ्यता) को आज तक अपने साथ लेकर चल रहे हैं, जोकि एक बहुत अच्छा प्रमाण हैं।

20 मई को हम लोग आदिस अबाबा से लगभग 80 किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम में स्थित अहा (Ayha) गये जहां हम लोगों ने प्राचीन गड़े हुए ऊंचे-ऊंचे पत्थर देखे, जिसमें विभिन्न-विभिन्न प्रकार के चिह्न थे। एक पत्थर पर हमने स्वास्तिक का चिह्न देखा। इन पत्थरों को देखने से यह पता चलता है कि यह भी 800 ईसा पूर्व से हैं। कई जगहों पर तलवार के निशान था। कुछ लिपि भी थी, जिसको हम लोग पढ़ नहीं सके। मैंने इस तरह के पत्थर आयरलैण्ड में खुदे हुए देखे हैं तथा इम्फाल में बर्मा के बॉर्डर पर आज भी ऐसे पत्थर मौजूद हैं।

21 मई को हम लोग नेशनल एक्जीबिशन में गये जहां पर भारत और इथोपिया के लोगों ने मिलकर स्टाल लगाये थे। इस स्टाल में 1950 से भारत के साथ जो मधुर सम्बन्ध रहा है, उसको दिखाया, जिसमें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की भूमिका प्रमुख थी।

22 मई को हम लोग आदिस अबाबा विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में गये और उनके साथ मीटिंग की। आदिस अबाबा विश्वविद्यालय के कई विद्वान भी मेकाले विश्वविद्यालय में हुए सेमीनार में सम्मिलित हुए थे तथा काफी प्रभावित थे। विश्वविद्यालय के लोगों के साथ MOU प्रस्तावित किया जिसको हमने स्वीकार किया और विश्वविद्यालय और महासभा भविष्य में इथोपिया में मिलकर अहिंसा प्रचार का काम करेंगे और अपनी प्राचीन संस्कृति के बारे में भी अनुसंधान करेंगे। प्रथम सचिव श्री विजय कुमार जी (भारतीय दूतावास आदिस अबाबा) ने बताया कि इथोपिया में जर्मन एम्बेसी के संस्कृति सचिव से दिनांक 23 मई को सायं 5 बजे मिलने का समय ले लिया है।

23 मई को ओरोमिया जनजाति के म्युज़ियम में गये जहां पर वहां के डायरेक्टर और डिप्टी डायरेक्टर से बात की और उन्होंने ओरोमिया संस्कृति के बारे में बताया और इसके साथ उन्होंने यह भी बताया कि 1 और 2 तारीख को वहां के विश्वविद्यालय जाॅम्बी में सेमीनार किया जा रहा है। उस सेमीनार में हमें बुलाया गया। हम लोग म्युज़ियम को नहीं देख सके क्योंकि उसका जीर्णोंद्धार हो रहा था। उन्होंने हमें ओरोमिया संस्कृति के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहयोग देंगे, ऐसा बताया।

शाम को हम 5 बजे जर्मन एम्बेसी में पहुंचे और वहां पर श्रीमान स्टीफन वेन (प्रथम सचिव वाणिज्य और संस्कृतिक विभाग, जर्मन एम्बेसी इथोपिया) से लगभग 45 मिनट तक चर्चा की। हमने उन्हें अपने आने का कारण बताया तो वे बहुत खुश हुए। वहां जीर्णोंद्धार का कार्य चल रहा है। वहां की हमें जानकारी प्राप्त करनी है। उन्होंने बताया कि यह सारा कार्य जर्मनी के विश्वविद्यालय से मिलकर करते हैं। इसलिए वह हम सबको उनका पता और फोन नम्बर दे देंगे, जिससे हम उन लोगों से सीधा सम्पर्क करके जानकारी प्रापत करते रहेंगे। उन्होंने हमारी सब बातों को अच्छी तरह से सुनकर और जर्मन एम्बेसी का पूरा सहयोग देने का वचन दिया।

इथोपिया का क्षेत्रफल 11 लाख, 4 हजार 3 सौ स्काॅयर मीटर का है। यहां पर 2 मौसम होते हैं। यहां अक्तूबर से मई तक शुष्क मौसम होता है और जून से सितम्बर तक नम मौसम। पूरा इथोपिया उंची पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ों की उंचाई 2 हजार और 3 हजार मीटर के लगभग है। परन्तु यहां पर 25 ऐसे पहाड़ हैं, जिनकी उंचाई 4 हजार मीटर से भी उंची है। यहां की मुख्य नदी ब्लू नाईल या अभय (Blue Nile) है जो इथोपिया में 1450 किलोमीटर लम्बी बहती है। यह नदी टाना लेक से निकलती है। इथोपिया की आबादी 9 करोड 66 लाख है। यहां पर खेती मुख्य व्यवसाय है, जिसपर इथोपिया की 90 प्रतिशत जनता की आय निर्भर करती है। इथोपिया में लगभग 83 तरह की बोलियां बोली जाती हैं। मुख्य बोली का नाम आमहरिक (Amharic) है।

24 मई को हम लोग आदिस अबाबा से नैरोबी पहुंचे और वहां पर ‘लोटस इन’ होटल में ठहरे। जहां पर श्रीमान प्रफुल्ल राजा जी हमसे मिलने आये। उन्होंने रात्रि में दिगम्बर जैन मन्दिर नैरोबी जोकि 1980 में कानजी के सान्निध्य में प्रतिष्ठित हुआ था, में आने के लिए निमंत्रित किया था। श्री प्रफुल्ल राजा श्री पवन जी जैन (मंगलायतन विश्वविद्यालय) के मित्र हैं। मन्दिर में सवा नौ बजे उनका प्रवचन समाप्त हुआ। हमने उन्हें अपने इथोपिया आने का उद्देश्य बताया और हमने इथोपिया में जैन धर्म के मिले प्रमाणों के बारे में उन्हें बताया, जिसे सुनकर वे बहुत खुश हुए और उन्होंने बताया कि इस तरह की बातें उन्हें अपने जीवन में पहली बार सुनने को मिली। उन्होंने पहली बार इथोपिया में जैन धर्म था, की बातें सुनी हैं। उन्होंने महासभा को सहयोग देने का आश्वासन दिया।

25 मई को टैक्नीकल विश्वविद्यालय (नैरोबी) में हमारा सेमीनार हुआ जिसमें अनेक विद्वानों ने जैन धर्म के अहिंसा धर्म के बारे में बताया और अफ्रीकन दर्शन (फिलोसफी) के बारे में बताया। इस मीटिंग में डॉ. पैटरिक एम. डिक्कर (डायरेक्टर सेंटर फाॅर साइंस एण्ड टैक्नोलाॅजी स्टडीज्) ने अफ्रीकन दर्शन के बारे में बताया और कहा कि हम लोग प्रकृति को प्रधानता देते हैं। उन्होंने अहिंसा धर्म की प्रशंसा करते हुए आपस में सहयोग करने की बात को स्वीकार किया।

श्रीमान सोलोमन ने घोषणा की कि अगला सेमीनार 13-14-15 दिसम्बर 2017 को किसुमु सिटी (Kisumu-City, Kenya ) में होना निश्चित हुआ है और यह स्थान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा का जन्म स्थान है। यह बहुत सुन्दर शहर विक्टोरिया झील के किनारे पर स्थित है और एक बन्दरगाह है। यहां पर ब्रिटिश साम्राज्य के समय के स्थापत्य कला के नमूने हैं। किसुमु सिटी में विशाल सेमीनार करने की जो घोषणा हुई, उसको हमने स्वीकार किया। डॉ. राजमल जी ने बताया कि वे जून के अंत तक इसका कार्यक्रम बनाकर सब जगह भेज देंगे। मीटिंग में काफी विद्वान उपस्थित थे और सब लोगों में बहुत उत्साह था।

दोहपर में 3 बजे श्री धीरू भाई जी ओसवाल जैन समाज नैरोबी के अध्यक्ष हैं, उनसे मिलने ओसवाल भवन नैरोबी गये। वहां पर हमने उन्हें अपने आने का उद्देश्य बताया और कहा कि यहां जैन संस्कृति थी। यह सुनकर उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि न तो उन्हें इसकी सूचना थी और न ही इस तरह का प्रयास पहले किया गया है। उन्होंने हमारा स्वागत करते हुए कहा कि इस तरह के कार्य में वे सब तरह से सहयोग देंगे। दूसरे दिन उन्हें प्रातःकाल शहर से बाहर जाना था। इसलिए हम उनसे और ज्यादा चर्चा नहीं कर सके।

हमारे अलावा अन्य लोगों ने वहां के नेशनल म्युज़ियम को देखा। उसके बाद वे डायरेक्टर जनरल से मिलने गये। परन्तु वे वहां नहीं मिले। परन्तु वहां एक आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. क्रिश्चनी ओगोला (Chrtstine Ogola) से मिले। उन्होंने हमें कई बातें नैरोबी और केन्या के बारे में बतायीं कि यहां पर 42 तरह की जनजातियां हैं और उनमें से अधिकांश अपनी पूर्व सभ्यता को बनाये रखना चाहते हैं। नैरोबी के लोगों से बात करने पर यह जानकारी मिलती है कि कुछ भी हो, वे अपनी प्राचीन सभ्यता को संजोये रखना चाहते हैं, जो जैन धर्म से मिलती है।

26 मई को कुछ लोग भारत के लिए रवाना हो गये। मैं और डॉ. राजमल जैन (अहमदाबाद) नेशनल म्युज़ियम को देखने गये और वहां पर सहायक निदेशक से मिले। उन्हें पुरातत्व के बारे में पूरा ज्ञान था। उनसे काफी विचार-विमर्श हुआ। उन्होंने अपने उच्चाधिकारी डॉ. फेडरिक क्यालो मान्थी से मिलने के लिए भेजा। यहां पर हमारी भेंट एक विद्यार्थी सुश्री दीनाह इंजेंडी (क्पंदंी प्दरमदकप) से हुई जो भारत आकर इतिहास और पुरातत्व की पढ़ाई करना चाहती हैं। हमने उनको स्काॅलरशिप की स्वीकृति प्रदान की। डॉ. फेडरिक क्यालो मान्थी से मिले। उनको हमने अपने आने का उद्देश्य बताया। हमारी बात सुनकर उन्होंने प्रसन्नता प्रकट की और अपना पूरा सहयोग अनुसंधान के कार्यों में देने के लिए आश्वासन दिया। हमने उन्हें भारत आने के लिए निमंत्रण दिया और बताया कि केन्या से 2 विद्यार्थियों को एमए इतिहास एवं पुरातत्व में पढ़ाई के लिए स्काॅलरशिप देना चाहते हैं। एक हमने चुन ली हैं दूसरे विद्यार्थी का नाम वह बतायें।

उनसे मिलकर हम दोनों तीन बजे पैराडाईज लाॅस्ट, ओल्ड स्टोर ऐज केव्स एंड वाॅटरफाॅल्स (Paradise Lost, Old Store Age Caves and Waterfalls) में गुफा देखने गये। यह बहुत सुन्दर जगह थी। वहां विशाल झील थी। गुफा झरने के पीछे बनी हुई थी। काफी लम्बी और बड़ी थी। यह झरना विश्व में एक ही है। जिसके पीछे भी जा सकते हैं और सामने से भी देख सकते हैं। इस जगह को देखने से यह बात मन में आई कि प्राचीनकाल में अवश्य यहां पर विशाल संख्या में जैन मुनि रहते होंगे और ध्यान तथा तपस्या करते होंगे।

27 मई को दोपहर 4 बजे रवाना होकर दिनांक 28 मई को रात्रि 1 बजे दिल्ली सकुशल पहुंचे। अफ्रीका में प्रथम सेमीनार में जो हमें अभूतपूर्व सफलता मिली है, उसकी हमें उम्मीद नहीं थी। परन्तु हम लोग जिनशासन की प्रभावना बढ़ाने गये थे। इसलिए हमारी यह यात्रा सफल रही। इस क्षेत्र में भविष्य में भी हमें निरन्तर कार्य कार्य करते रहना पड़ेगा और इसके लिए चतुर्विद संघ से प्रार्थना करता हूं कि इस कार्य में अपना आशीर्वाद, मार्गदर्शन एवं सहयोग देते रहें।

हमने इस यात्रा के पहले परमपूज्य आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज, आचार्यश्री विरागसागर जी महाराज, आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज, गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी, गणिनी आर्यिकाश्री चन्द्रमति माताजी, आर्यिका श्री दक्षमति माताजी एवं आर्यिकारत्न श्री गौरवमति माताजी से आशीर्वाद प्राप्त कर लिया था।

श्री निर्मल कुमार जैन ( सेठी )

 

जन्म तिथि-जन्म स्थल 8 जुलाई, 1938 - तिनसुकिया (आसाम)
पिता का नाम एवं पता स्वर्गीय श्री हरकचन्द जैन सेठी
हरकचन्द रोलर फ्लोर मिल्स, सीतापुर (उत्तर प्रदेश)
शैक्षिक योग्यता बी.कॉम - सेंट जेवीयर्स कालेज, कोलकाता विश्वविद्यालय
सम्मान महासभा अध्यक्ष्यता रजत महोत्सव में 4 जनवरी ’06 को श्रवणबेलगोल (कर्नाटक) में स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामीजी द्वारा ‘श्रावकरत्नमणि’ उपाधि से सम्मानित
संबंधित संस्थाएं राष्ट्रीय अध्यक्ष : श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (धर्म संरक्षिणी) महासभा, लखनऊ
स्थापित 1894 - 3 जनवरी सन् 1982 से निरन्तर अध्यक्ष निर्वाचित।
श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (तीर्थ संरक्षिणी) महासभा,लखनऊ - स्थापना वर्ष 1998 से।
श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (श्रुत संवर्धिनी) महासभा, नई दिल्ली - स्थापना वर्ष 2004 से।
जैन राजनैतिक चेतना मंच
सुन्दरी संगीत कला अकादमी, नई दिल्ली।
-स्थापना वर्ष 2014
समस्त जैन संस्थाओं की समन्वय समिति, नई दिल्ली। - स्थापना वर्ष 2015
श्री दिगम्बर जैन कुण्डलपुर वैशाली तीर्थ क्षेत्र कमेटी, वैशाली, बिहार।
श्री गोपाल दिगम्बर जैन सिद्धान्त संस्कृत महाविद्यालय, मुरैना (मध्य प्रदेश)

इंटरनेशनल सेंटर फाॅर निगन्थ ट्रेडीशन
स्थापना वर्ष 2019

परम संरक्षक : श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महिला महासभा, नई दिल्ली।
-स्थापना वर्ष 2006

न्यासी : श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा चेरिटेबल ट्रस्ट-स्थापना
वर्ष 1988 से।

अध्यक्ष (एनआरआई कमेटी) : गोम्मेटश्वर भगवान श्री बाहुबली स्वामी महामस्तकाभिषेक महोत्सव
समिति-2018 श्रवणबेलगोल।

सदस्य-गवर्निंग कौसिंल एवं परम संरक्षक : भगवान महावीर मैमोरियल समिति, नई दिल्ली।

संरक्षक : श्री दिगम्बर जैन अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी रायगंज, अयोध्या, उत्तर प्रदेश

मंत्री : आर. एम. पी. डिग्री कालेज, सीतापुर, उत्तर प्रदेश।
प्रबन्ध न्यासी : सेठी परमार्थिक ट्रस्ट, गुवाहटी।
हरकचन्द निर्मल कुमार जैन चेरिटेबल ट्रस्ट, सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

निर्देशन में प्रकाशन
शोध ग्रन्थ एवं पत्रिकाएं:
लखनऊ से प्रकाशित :  जैन गजट (हिन्दी-भारत का सर्वाधिक प्राचीन साप्ताहिक)
प्राचीन तीर्थ जीर्णोंद्धार (मासिक)
श्रुत संवर्धिनी (मासिक)
जैन महिलादर्श (मासिक)
विभिन्न धार्मिक, पुरातत्व, शैक्षिक एवं शोध ग्रन्थ
धर्म प्रभावना-अध्ययन-यात्राएं नार्थ एवं साउथ अमरीका, इंग्लैण्ड, यूरोप, जापान, मध्य एवं सुदूर-पूर्व एशिया।
पता 5, खण्डेलवाल जैन मन्दिर काम्प्लेक्स्स्स, राजा बाज़ार, शिवाजी स्टेडियम के पास, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली - 110001
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